14 साल की उम्र में आन्दोलन करने पर आजाद को मिली थी सजा
14 साल की उम्र में आन्दोलन करने पर आजाद को मिली थी सजा
उत्तर-प्रदेश

14 साल की उम्र में आन्दोलन करने पर आजाद को मिली थी सजा

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- सामाजिक दूरी के बीच तिलक और आजाद की मनायी गयी जयंती - सामाजिक दूरी के बीच बाल गंगाधर तिलक व चन्द्रशेखर आजाद की मनायी गई जयंती हमीरपुर, 23 जुलाई (हि.स.)। सुमेरपुर कस्बे में सामाजिक दूरी के बीच गुरुवार को शाम बाल गंगाधर तिलक और चन्द्रशेखर आजाद की जयंती मनाते हुये साहित्यकारों ने उन्हें याद किया है। जरा याद करो कुर्बानी और जिनका देश ऋणी है कार्यक्रम के तहत आज दो महान विभूतियों तिलक और आजाद की जयंती मनायी गयी। वर्णिता संस्था के अध्यक्ष एवं साहित्यकार डा.भवानीदीन ने कहा कि बाल गंगाधर तिलक अपने लगभग साढ़े छ दशकों के जीवन में देश के लिए जिए। इनका जन्म 23 जुलाई 1856 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले हुआ था। उन्होंने 1895 में कहा था कि स्वराज्य मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है, मैं इसे लेकर ही रहूंगा। साथ ही शिक्षा स्वदेशी और बहिष्कार की अवधारणा का भी तिलक ने समर्थन किया था। तिलक प्रमुख उग्रवादी नेता थे। उन्होंने युवाओं के लिए एक मंच तैयार किया, जिस के बैनर तले बहुत सारे युवा आजादी के संघर्ष के लिए तैयार हो गए। तिलक के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। अंततः एक अगस्त 1920 को तिलक का निधन हो गया। तिलक आज भी प्रासंगिक हैं। इन्हें विस्मृत नहीं किया जा सकता है। चंद्रशेखर आजाद क्रांतिकारी आंदोलन के बहुत बड़े सूरमा थे। उनके लगभग ढाई दशकों के जीवन में सदैव उनकी रगों में देश प्रेम रमा रहा। उन्होंने तत्कालीन क्रांतिकारी युवाओं को क्रांति का उदघोष कर यह कहा था कि हम आजाद रहे हैं और आजाद रहेंगे। ब्रिटिश साम्राज्य के पास कोई ऐसी गोली नहीं है, जो चंद्रशेखर आजाद को मार सके। आजाद का जन्म 23 जुलाई 1906 को झाभुआ जिले के भावरा में सीताराम तिवारी के घर हुआ था। 14 वर्ष की उम्र में बहिष्कार आंदोलन के अंतर्गत इन्हें 15 बेतों की सजा मिली थी। जिसे पूरी निडरता के साथ उन्होंने सहा था। शरीर रक्तरंजित हो गया था किंतु हिम्मत नहीं हारे थे। तभी से इनका नाम आजाद पड़ गया। ये काकोरी कांड से लेकर असेंबली बम कांड तक क्रांतिकारियों के साथ रहे किंतु इन्हें पुलिस पकड़ नहीं सकी। अंततः 27 फरवरी 1931 कोअल्फ्रेड पार्क इलाहाबाद में एक सशस्त्र संघर्ष में बहादुरी के साथ मुकाबला किया। घायल होने पर एक गोली शेष रहने पर खुद अपने मार ली।आजाद इस तरह से देश के लिए कुर्बान हो गये। सही मायने में चन्द्र शेखर आजाद देश के लिए जिए और देश के लिए मरे। इनके योगदान को कभी भी भुलाया नहीं जा सकता है। कार्यक्रम में अवधेश कुमार गुप्त एडवोकेट, राजकुमार सोनी सर्राफ, राधारमण गुप्त, संदीप सिंह, कल्लू चौरसिया, गीता ओमर और लल्लन गुप्ता मौजूद रहे। हिन्दुस्थान समाचार/पंकज/मोहित-hindusthansamachar.in