'देश की खुशहाली के लिए शहरी बुराइयों को गांवों में आने से रोकना होगा'
'देश की खुशहाली के लिए शहरी बुराइयों को गांवों में आने से रोकना होगा'
उत्तर-प्रदेश

'देश की खुशहाली के लिए शहरी बुराइयों को गांवों में आने से रोकना होगा'

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फिर चलें गांव की ओर वेबिनार में बोले वक्ता गाजियाबाद, 16 अक्टूबर (हि.स.)। शनिवार को आयोजित फिर चले गांव की ओर वेबिनार में इस बात पर जोर किया कि वर्तमान में शहरों की बुराइयां गांवों में आ रही है। जिनसे गांवों का भी वातावरण बदल रहा है। इस लिए जरूरी है कि शहरी बुराईयों को गांवों में आने से रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जाने चाहिए। तभी देशहाल खुशहाल हो सकेगा। अरिहंत चेरिटेबल एजुकेशल ट्रस्ट के तत्वावधान में आयोजित इस वेबिनार में वक्ताओं ने कहा कि गांव कल्पनाओं में अच्छे लगते हैं लेकिन हकीकत यह है कि शहरी बुराइयों गांवों में आ रही हैं और गांव की अच्छाइयां खत्म होने लगी हैं। अध्यक्षता मेवाड़ ग्रुप आफ इंस्टीट्यूशंस के चेयरमैन डाॅ. अशोक कुमार गदिया ने की। वेबिनार में हैवेल्स इंडिया लिमिटेड के उपाध्यक्ष आरपी जैन मुख्य आरपी जैन ने कहा कि आज गांव पिछड़ रहे हैं शहर विकसित हो रहे हैं। इस कारण गांवों से लोगों का लगातार पलायन हो रहा है। इसे रोकना होगा। उन्होंने कहा कि शहरों में 90 प्रतिशत मजदूर गांव देहात से हैं। ज्यादा कमाने की ललक या रोजगार की तलाश उन्हें बरबस शहरों की ओर खींच रही है। शहरों में शांति नहीं है। तनाव बहुत बढ़ गया है। लोग संयुक्त परिवार की संकल्पना व अपने संस्कारों को भूलते जा रहे हैं। शिक्षाविद राजकुमार भाटी ने कहा कि गांव की अच्छाइयां तो दम तोड़ने लगी हैं और शहरों की बुराइयां गांवों में प्रवेश कर रही हैं। शहर की सड़ी-गली सब्जियां व पाॅलीपैक दूध की थैलियां गांवों में आने लगी हैं। ग्रामीण गांवों से दूध लेकर शहरों को जाते हैं तो वापसी में वहां से शराब भरकर ला रहे हैं। इसे अब ग्रामीण अपनी आजीविका चलाने का साधन मानने लगे हैं। डाॅ. अशोक कुमार गदिया ने कहा कि गांवों में डाॅक्टर नहीं आता। आता है तो अपना कहीं ओर तबादला करवा लेता है। यही हाल सरकारी शिक्षक का भी है। जब हम शहरों को नहीं छोड़ना चाहते तो गांवों में आएगा कौन। हालत यह है कि हमारी आजीविका आज भी गांवों से चल रही है लेकिन बच्चों को पढ़ाने के लिए शहरों में आना पड़ता है। असुरक्षा से दूर रहने के लिए शहर आते हैं लोग मगर यहां भी असुरक्षा बढ़ती जा रही है। सामाजिक समस्या आज ज्यादा है। सरकारें गांवों के विकास पर खर्च ही नहीं कर रहीं। सरकारें वहां दस रुपये लगा देंगीं जहां से उन्हें सौ रुपये की कमाई होती दिखाई देगी। इसलिए हमें अपना माइंड सेट बदलना होगा। अलका अग्रवाल ने कहा कि इसके लिए एक सार्थक पहल करने की आवश्यकता है। एक ऐसा मंच तैयार करने की जरूरत है। जहां विद्वानों के विचारों का आदान-प्रदान हो। उन विचारों को संकलित किया जाए। उनके विचारों के संकलन के आधार पर ठोस योजना को अमलीजामा पहनाया जाये। तभी गांवों में खुशहाली रोजगार कृषि आदि को बढ़ावा मिलेगा। वेबिनार में मौजूद सभी अतिथियों ने तय किया कि इन विचारों के आधार पर गांवों का विकास हो। जिसके लिए एक गांव गोद लेकर उसे आदर्श गांव बनाया जाए। हिन्दुस्थान समाचार/फरमान/दीपक-hindusthansamachar.in