...हिन्दी का वह सेनानी जिसने राष्ट्रभाषा के सम्मान में छोड़ दी थी सरकारी नौकरी
...हिन्दी का वह सेनानी जिसने राष्ट्रभाषा के सम्मान में छोड़ दी थी सरकारी नौकरी
उत्तर-प्रदेश

...हिन्दी का वह सेनानी जिसने राष्ट्रभाषा के सम्मान में छोड़ दी थी सरकारी नौकरी

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-उम्र के 80 वें पड़ाव में भी जारी है गांधीगीरी -विनोबा भावे ने संघर्ष के लिए किया प्रेरित रायबरेली, 13 सितम्बर(हि.स.)। राष्ट्रभाषा हिन्दी के सम्मान के लिए आज भी एक सेनानी का सतत संघर्ष जारी है। संत विनोबा भावे के शिष्य और जयप्रकाश नारायण के सहयोगी रवींद्र सिंह चौहान का हिन्दी के लिए जज़्बा उम्र के 80 वें पड़ाव में भी कम नहीं हुआ है। आज भी वह गांधीवादी तरीके से देश मे राष्ट्रभाषा को सम्मान दिलाने के लिए उपवास करते हैं।हालांकि लंबे संघर्ष के बाद उन्हें लगता है कि वह अकेले रह गए हैं लेकिन वह मानते हैं कि हिन्दी का यह संघर्ष उनके लिए एक पूजा के समान है जिसे वह अंतिम समय तक करेंगे। रायबरेली के जगतपुर के पास टीकर आगचीपुर के रहने वाले रविन्द्र सिंह महात्मा गांधी से बेहद प्रभावित हैं, उनका हिन्दी को लेकर चल रहा संघर्ष आज भी गांधीवादी तरीके से चल रहा है। विनोबा भावे का यह कथन कि देश में ही हिन्दी को उसका हक न मिले यह बर्दाश्त नहीं किया जा सकता, उनके लिए मंत्र बन चुका है। रविन्द्र सिंह कहते हैं वह अंग्रेजी के खिलाफ़ नहीं है लेकिन हिन्दी का अपमान बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं। हिन्दी के लिये छोड़ दी सरकारी नौकरी रवीन्द्र सिंह की ने एमए करने के बाद रक्षा मंत्रालय में 1965 में मेरठ से लेखाधिकारी की नौकरी शुरू की।मंत्रालय में अंग्रेजी का वर्चस्व उन्हें हमेशा कचोटता रहता था जिसके लिए वह हमेशा मुखर रहे। वह अपना हस्ताक्षर हिन्दी में ही करते थे, जब उन्हें इसके लिए रोका गया तो उन्होंने उच्च अधिकारियों से लिखा पढ़ी शुरू कर दी और उन्हें हिन्दी में ही हस्ताक्षर की अनुमति मिली लेकिन बाद में जब अधिकारियों का दबाब बना की उन्हें प्रपत्रों पर हस्ताक्षर हिन्दी में ही करने पड़ेंगे तो उन्होंने 1970 में नौकरी से इस्तीफ़ा देना ही उचित समझा। चौहान के इस्तीफ़े का मामला उस समय प्रसिद्ध कवि और राज्यसभा सदस्य राम धारी सिंह दिनकर के पास भी पहुंचा। दिनकर ने जो उस समय हिन्दी सलाहकार समिति के सदस्य ने जोर शोर से उठाया। नौकरी से इस्तीफ़े के बाद उनका संघर्ष हिन्दी को लेकर और तेज हो गया। हिन्दी के लिए कई आंदोलन और संघर्ष उन्होंने किये और अपनी लड़ाई जारी रखी। मातृभाषा के सम्मान के लिए करते हैं 'गांधीगीरी' रवीन्द्र सिंह चौहान विनोबा भावे के भूदान आंदोलन,डकैतों के आत्मसमर्पण जैसे कई आंदोलनों के साथ हिन्दी के लिए भी सतत संघर्ष कर रहे है। इसके लिए वह विदेशी भाषा गुलामी मुक्ति अभियान नाम से एक आंदोलन भी चलाते हैं जिसके माध्यम से वह गांधीवादी तरीक़े से आंदोलनों को करते हैं। उपवास इसका प्रमुख माध्यम है। 80 वर्ष की उम्र में भी वह हिन्दी दिवस और गांधी जयंती पर उपवास करते हैं। यह उपवास 50 घंटे तक चलता है। प्रयागराज में उनके इस उपवास के साथ भारी संख्या में छात्र जुड़ते हैं। उनके उपवास के दौरान लोगों को हिन्दी के उपयोग व विदेशी भाषा से मुक्ति का संकल्प दिलाया जाता है। इसके अलावा वह बेहद सक्रिय हैं देश के अन्य भागों में वह जाकर लोगों को हिन्दी के लिए प्रेरित करते रहते हैं। अहिन्दी भाषी प्रदेशों गुजरात व महाराष्ट्र में भी वह नियमित तौर पर जाकर लोगों को मातृभाषा के प्रति सम्मान और हिन्दी के प्रति अनुराग का पाठ पढ़ाते हैं। रवीन्द्र सिंह चौहान का इस उम्र में भी यह संघर्ष जारी है अपनी मातृभाषा के सम्मान और स्वाभिमान दिलाने के लिये। हिन्दुस्थान समाचार/रजनीश/राजेश-hindusthansamachar.in