सीएसआईआर-सीडीआरआई कोरोना संक्रमण की पुनरावृत्ति की संभावना का लगाया जाएगा पता
सीएसआईआर-सीडीआरआई कोरोना संक्रमण की पुनरावृत्ति की संभावना का लगाया जाएगा पता
उत्तर-प्रदेश

सीएसआईआर-सीडीआरआई कोरोना संक्रमण की पुनरावृत्ति की संभावना का लगाया जाएगा पता

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-सीरोलॉजिकल परीक्षण में जोखिम कारकों और एंटीबॉडी की जांच को लेकर किया जा रहा शोध अध्ययन लखनऊ, 11 सितम्बर (हि.स.)। सीएसआईआर-सीडीआरआई एक शोध अध्ययन कर रहा है, जिसमें लोगों में कोरोना वायरस के खिलाफ एंटीबॉडी की जांच के लिए परीक्षण किया जा रहा है। इसके साथ ही इसमें अन्य जैव-रासायनिक मापदंडों का अध्ययन भी किया जाएगा, जिससे कार्डियोमेटाबोलिक रिस्क फैक्टर यानि जोखिम कारकों और संक्रमण की पुनरावृत्ति की संभावना के बीच परस्पर संबंधों का पता भी लगाया जा सके, जैसा कि अनेक कोरोना मरीजों की ठीक होने के बाद दिल का दौरा पड़ने से मौत देखी जा रही है। दरअसल बीते सात महीनों से कोरोना महामारी के कारण भारत में 45 लाख से अधिक व्यक्ति इस वायरस से संक्रमित हो चुके हैं, जिसके परिणामस्वरूप 76,270 से अधिक की जान जा चुकी हैं। सीएसआईआर-सीडीआरआई के इस रिसर्च के नोडल वैज्ञानिक डॉ. सुशांत कार और डॉ. अमित लाहिड़ी ने हिन्दुस्थान समाचार को बताया कि भारत में किए गए क्लिनिकल ट्रायल काफी हद तक लक्षणों को दिखाने वाले लोगों और उन लोगों के साथ निकट सम्पर्क में आने वाले व्यक्तियों तक सीमित रहे हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात है कि सामुदायिक परीक्षण यानि कम्युनिटी टेस्टिंग अभी तक शुरू नहीं किया गया है। विभिन्न देशों से उपलब्ध रिपोर्टों के आधार से यह माना जा सकता है कि अभी अनेक एसिम्पटोमेटिक यानि लक्षणविहीन मामले हैं जिनका परीक्षण नहीं किया गया है। इसलिए बीमारी का बोझ भीषण हो सकता है। डॉ. सुशांत और डॉ- अमित के मुताबिक रोग से संक्रमित व्यक्ति का शरीर एंटीबॉडी उत्पन्न करता है जो उसे भविष्य में इस संक्रमण से उनकी रक्षा करने में मदद कर सकता है। हालांकि, यह एक नवीन वायरस है, इसलिए इस प्रकार की एंटीबॉडी से सुरक्षा की अवधि अभी ज्ञात नहीं है। इसलिए सीरोलोजिकल टेस्टिंग के लिए एक लंबी अवधि के पैन-इंडिया सर्विलांस (अखिल भारतीय निगरानी) बेहद महत्वपूर्ण है। जिससे सीरोलॉजी-आधारित जांच का उपयोग करके न केवल संक्रमण के बोझ का अनुमान लगाया जा सके, बल्कि निश्चित अंतराल पर नमूने एकत्र करके एंटीबॉडी की मात्रा (टाइटर) का भी आकलन किया जा सके। इससे उन लोगों की पहचान करने में भी मदद मिलेगी जो अपने प्लाज्मा को बीमार रोगियों को दान कर सकते हैं। सीएसआईआर-सीडीआरआई के निदेशक प्रोफेसर तपस के कुंडू के मुताबिक समग्र भारत में जैविक नमूनों के अध्ययन के जरिए स्थापित इस प्रकार की समेकित जानकारी के कोहार्ट (जत्थे से) बड़े पैमाने पर राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की संरचना के अनुरूप क्लिनिकल निर्णय करने में सहायता के लिए राष्ट्रीय संदर्भ मानकों के विकास की सुविधा प्रदान करेगी। साथ ही राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति संबंधी नीति के निर्धारण में मददगार होगी। इसके अलावा यह नवीन कोरोना वायरस से होने वाले संक्रमण पर अनेक अनसुलझे सवालों का जवाब तलाशने में भी मदद करेगा। विगत 9-11 सितम्बर तक यह सीरोलोजिकल परीक्षण सभी सीएसआईआर कर्मचारियों और छात्रों के लिए मुफ्त एवं स्वेच्छिक था। इस दौरान लिए गए रक्त के नमूनों में एंटी-सार्स-सीओवी2 एंटीबॉडी टाइटर्स की उपस्थिति या अनुपस्थिति का आकलन सीएसआईआर-आईजीआईबी, नई दिल्ली में एलिसा आधारित जांच के माध्यम से किया जाएगा। यह सीरोलोजिकल टेस्ट प्रोजेक्ट, सीएसआईआर के एक अन्य आंतरिक कार्यक्रम 'फीनोम इंडिया- स्वास्थ्य परिणामों के दीर्घकालिक अनुदैर्ध्य समग्र अध्ययन' के साथ अच्छी तरह से एलाइन यानि संरेखित होकर व्यापक दृष्टिकोण प्रदान करेगी। हिन्दुस्थान समाचार/संजय/राजेश-hindusthansamachar.in