संस्कृत ही संस्कार और संस्कृति की भाषा है : प्रो. भगीरथ प्रसाद
संस्कृत ही संस्कार और संस्कृति की भाषा है : प्रो. भगीरथ प्रसाद
उत्तर-प्रदेश

संस्कृत ही संस्कार और संस्कृति की भाषा है : प्रो. भगीरथ प्रसाद

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वाराणसी, 12 सितम्बर (हि.स.)। संस्कृत ही संस्कार और संस्कृति की भाषा है। इसी के माध्यम से भारतीय भाव का जन्म हो रहा है। यदि आज संस्कृत को ही माध्यम बनाकर भारतीय अभिनय कला एवं गीत बनें और प्रसारित हो, तो निश्चित ही संस्कृत भाषा का उत्थान सम्भव है। शनिवार को ये बातें महामहोपाध्याय पद्मश्री प्रो.भगीरथ प्रसाद त्रिपाठी "वागीश शास्त्री" ने कही। अवसर रहा सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के व्याकरण विभाग एवं पाणिनी शोध संस्थान बिलासपुर छत्तीसगढ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित "संस्कृत के उत्थान में संस्कृत चलचित्र की भूमिका देव भाषा संस्कृत के संवर्धन में अहं ब्रह्मास्मि का अवदान" विषयक वर्चुअल अन्तरराष्ट्रीय संगोष्ठी एवं सम्मान समारोह का। बतौर मुख्य अतिथि प्रो.वागीश शास्त्री ने कहा कि अहं ब्रह्मर्षि की अपार सफलता से संस्कृत भाषा को माध्यम बनकर फिल्म या टी वी धारावाहिक बनाये जाने पर विचार होना चाहिए। गोष्ठी में सारस्वत अतिथि पूर्व कुलपति पद्मश्री अभिराज राजेन्द्र मिश्र ने कहा कि भाषा के समुन्नयन में फिल्मों तथा धारावाहिकों की भूमिका का अति महत्व है। संस्कृत भाषा की फिल्म अहं ब्रह्मर्षि की अपार सफलता विश्व व्यापी क्रान्ति जैसा रहा। पूर्व कुलपति प्रो. राधा वल्लभ त्रिपाठी ने कहा कि जिनको पूरी दुनिया नाट्यशास्त्र के मर्मज्ञ के रुप में जानती है। ऐसे अहं ब्रह्मर्षि के अभिनेता महर्षि आजाद एवं अभिनेत्री कामिनी दुबे को संस्कृत भाषा में भाषा की शुद्धता को ध्यान से बोलने एवं अभिनय के लिये धन्यवाद। उन्होंने संस्कृत के काव्य एवं आधुनिक नाटकों के ऊपर संस्कृत फिल्म की आवश्यकता पर बल दिया। गोष्ठी में अहं ब्रह्मर्षि के अभिनेता, लेखक एवं निर्माता महर्षि आजाद ने कहा कि संस्कृत देववाणी भाषा है अपने मन, जिह्वा पर लाने मात्र से ही सम्पूर्ण रुप से हम शुद्ध और धन्य महसूस करते हैं। यही भाव रखकर ही संस्कृत की पहली फिल्म अहं ब्रह्मस्मि बनाने के लिए प्रेरित हुआ। आज सभी लोग सराह रहे है। यह भी देवताओं के दृष्टि फल ही है। अभिनेत्री कामिनी दूबे ने कहा कि संस्कृत भारतीय संस्कृति की आत्मा है यदि संस्कृत है तो यह देश है। अध्यक्षता राष्ट्रपति से सम्मानित महामहोपाध्याय प्रो.पुष्पा दीक्षित ने किया। उन्होंने अभिनेता आजाद को संस्कृत पुरुष की संज्ञा देते हुये कहा कि आज ऐसे निर्देशकों और अभिनेताओं की जरूरत है, जो संस्कृत के उत्थान एवं राष्ट्र भावना की सोच रखते हैं। गोष्ठी का संचालन व्याकरण विभागाध्यक्ष प्रो. ब्रजभूषण ओझा ने किया। हिन्दुस्थान समाचार/श्रीधर/राजेश-hindusthansamachar.in