विमल तीर्थ पिशाचमोचन कुंड पर किन्नर समाज ने अपने पूर्वजों की आत्मा की शान्ति के लिए किया त्रिपिंडी श्राद्ध
विमल तीर्थ पिशाचमोचन कुंड पर किन्नर समाज ने अपने पूर्वजों की आत्मा की शान्ति के लिए किया त्रिपिंडी श्राद्ध
उत्तर-प्रदेश

विमल तीर्थ पिशाचमोचन कुंड पर किन्नर समाज ने अपने पूर्वजों की आत्मा की शान्ति के लिए किया त्रिपिंडी श्राद्ध

news

—किन्नर अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी ने किन्नर गुरु एकता जोशी के आत्मा की शान्ति के लिए कराया विशेष पूजन वाराणसी,16 सितम्बर (हि.स.)। पितृ पक्ष के चतुर्दशी तिथि पर बुधवार को धर्म नगरी काशी के विमल तीर्थ पिशाचमोचन कुंड पर किन्नरों ने अपने अतृप्त पितरों की आत्मा की शांति के लिए विधि विधान से त्रिपिंडी श्राद्ध किया। किन्नर अखाड़ा की आचार्य महामंडलेश्वर लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी के अगुवाई में किन्नरों ने कोरोना संकट काल में मृत साथियों के साथ अपने पूर्वजों की आत्मा की शान्ति और उनके मोक्ष की प्राप्ति के लिए परमपिता से प्रार्थना भी किया। वर्ष 2016 से शुरू इस परम्परा के निर्वहन में किन्नरों ने नई दिल्ली में मौत के घाट उतारी गईं किन्नर गुरु एकता जोशी के आत्मा की शान्ति के लिए विशेष पूजन-अर्चन किया। उनके हत्यारों की गिरफ्तारी के लिए भी भगवान से प्रार्थना की। तीर्थ पुरोहित मुन्ना पांडेय और उनके पुत्र नीरज पांडेय के अगुवाई में 11 वैदिक कर्मकांडी ब्राम्हणों ने श्राद्ध कर्म कराया। आचार्य महामंडलेश्वर लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी ने बताया कि कोरोना काल में हमारे समाज के मृत लोगों की आत्मा की शान्ति के लिए किन्नर अखाड़ा ने श्राद्ध कर्म कराया है। साथ ही परमपिता परमेश्वर से प्रार्थना किया है कि इन आत्माओं को सदगति प्रदान करें। किन्नर अखाड़ा ने अपने धर्म का पालन करते हुए चारों दिशाओं के मृत किन्नरों की अतृप्त आत्मा की शान्ति के लिए श्राद्ध कर्म किया है। उन्होंने बताया कि किन्नर अखाड़ा की स्थापना 2015 में हुई। 2016 में मै किन्नर अखाड़े का महामंडलेश्वर बना। तभी तय हुआ कि हर दूसरे साल अपने समाज का साथ छोड़ गये लोगों का श्राद्ध कर उन्हें परमधाम की प्राप्ति के लिए ईश्वर से प्रार्थना करेंगे। विमल तीर्थ के तीर्थ पुरोहित नीरज पांडेय ने 'हिन्दुस्थान समाचार' को बताया कि कुंड पर किन्नरों ने अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्धकर्म और त्रिपिंडी श्राद्ध किया है। एक त्रिपिंडी पर 44 आत्माओं को मुक्ति मिलती है। बताते चले, इतिहास में पहली बार महाभारत काल में शिखंडी ने पिंडदान किया था। इसके सैकड़ों साल बाद वाराणसी में किन्नर अखाड़े की महामंडलेश्वर लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी के सानिध्य में किन्नर अपने पूर्वजों का पिंडदान पिछले तीन वर्षो से कर रहे है। किन्नर समाज का मानना है कि समाज उनसे दूरी बनाकर तिरस्कार करता रहता है। सनातन धर्म में पैदा होने के बाद धर्म के 16 संस्कार जरूरी हैं,इसमें ये श्राद्धकर्म भी है। हमारे समाज में मृत्यु होने पर पार्थिव शरीर को बस जला देते हैं। इसलिए इस संस्कार को हमने एकजुट होकर करने का फैसला लिया है। सनातन धर्म में पितृ योनि की स्वीकृति और आस्था के कारण श्राद्ध किया जाता है। श्राद्ध करने का अधिकार सभी को है। इससे अतृप्त आत्मा परमधाम को प्राप्त होती है। श्राद्ध कर्म में किन्नर अखाड़ा गुजरात की पायलानंद गिरी, पार्वतीनंद गिरी, अलका पार्वती, महाराष्ट्र की धुलिया, पवित्रा, कामिनी आदि शामिल रही। हिन्दुस्थान समाचार/श्रीधर/मोहित-hindusthansamachar.in