कालका देवी मंदिर हिन्दू मुस्लिम एकता के प्रतीक के रूप में है विख्यात
कालका देवी मंदिर हिन्दू मुस्लिम एकता के प्रतीक के रूप में है विख्यात
उत्तर-प्रदेश

कालका देवी मंदिर हिन्दू मुस्लिम एकता के प्रतीक के रूप में है विख्यात

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इटावा,17अक्टूबर (हि.स.)। शारदीय नवरात्रि प्रारंभ होने से दुनिया की नो शक्तिपीठों में एक स्वर्ण नगरी का कालका मंदिर भी माना जाता है। जनपद में बकेवर कस्बे से तीन किलोमीटर की दूरी पर स्थित लखना प्राचीन काल में स्वर्ण नगरी के नाम से विख्यात था और यहां पर बना कालका देवी का मंदिर हिंदू मुसलमानों की एकता के प्रतीक के रूप में विख्यात है जहां एक और इस मंदिर में माता काली नाचती हैं तो उन्हीं के आंगन में एक और सैयद पीर बाबा का मजार भी है जहां मुसलमान एक साथ पूजा करते हैं। पूर्व काल में दिलीप नगर के जमीदार लखनऊ में आकर रहने लगे थे। वह स्थान आज भी पूरी तरह सुरक्षित है। यहां के जमींदार राव यशवंतराव मां के भक्त थे, उन्हें यमुनापार कर इसी घर में मंदिर पर माता की पूजा के लिए जाना पड़ता था। बरसात के दिनों में राव साहब नियमित रूप से मां के दर्शन करने के लिए जाते थे। तो एक बार यमुना में भयंकर बाढ़ आ गई। नाव चलाने वाली महिलाओं ने उन्हें यमुना पार कराने से इंकार कर दिया। जमीदार के साथ महिलाओं के बर्ताव के बाद वह वापस बिना माता के दर्शन किए लौट कर अपने घर दुखी मन लेकर बैठ गए। पुराने बुजुर्ग बताते हैं कि लखना में जहां पर मंदिर बनाया गया है वहां पर पहले बेर का पेड़ हुआ करता था।वहीं पर बाग में बड़ा पीपल का पेड़ भी था। वहां पर राव साहब रुके तो उन्हें नींद आ गई। तब माता ने उन्हें स्वप्न दिया कि अब तुम्हारी समस्या में खत्म करके यहीं पर प्रकट होती हूं। इतना कहकर देवी गायब हो गई और पीपल के पेड़ में आग लग गई। इस घटना के बाद प्रकृटी कालका देवी के लिए राव साहब ने वहां पर मंदिर का निर्माण कराया गया। उसके बाद से वह मंदिर आस्था का प्रतीक बना हुआ है। यहां हर साल दो बार लगने वाले मेले में हिस्सा लेने के लिए उत्तर प्रदेश के अलावा मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात तक से लोग आते हैं। पहले माता उसके बाद सैयद बाबा की पूजा किए बिना भक्तों की मन की मुराद पूरी नहीं होती है। यहां पर दलित वर्ग का पुजारी रहता है जो सभी वर्ग के लोगों को पूजा पाठ कराने में मददगार रहता है। हिन्दुस्थान समाचार/रोहित/मोहित-hindusthansamachar.in