ऑनलाइन कहानी परिचर्चा - परिवेश में बिखरी कहानियों को लिखने को किया प्रेरित
ऑनलाइन कहानी परिचर्चा - परिवेश में बिखरी कहानियों को लिखने को किया प्रेरित
उत्तर-प्रदेश

ऑनलाइन कहानी परिचर्चा - परिवेश में बिखरी कहानियों को लिखने को किया प्रेरित

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बांदा,07 सितम्बर (हि.स.)। कोई भी कहानीकार अपनी रचना की विषय वस्तु अपने परिवेश से ही उठाता है। कहानियां हमारे इर्द-गिर्द घूमती रहती हैं। कहानियों के तमाम पात्र विविध रूपों में न केवल हमसे संवाद करते हैं बल्कि हमारे दैनंदिन जीवन में तमाम सामाजिक व्यवहारों में शामिल भी होते हैं। कहानियों में व्यक्त दृष्टिकोण, भाषाशैली, सौंदर्यबोध एवं मूल्यों के महत्व को स्वीकारते हुए कक्षा शिक्षण के दौरान बच्चों से उनके परिवेश में बिखरी हुई कहानियों को समझने एवं लिखने को प्रेरित करने की जरूरत है। उक्त विचार शैक्षिक संवाद मंच, बांदा की साप्ताहिक ऑनलाइन कहानी परिचर्चा पर विशेषज्ञ वक्ता के रूप में रामनरेश गौतम (उत्तराखंड) एवं शांति प्रिया (राजस्थान) ने व्यक्त किए। दोनों ने आगे कहा कि कहानियों पर काम करते हुए कभी भी बच्चों के साथ कहानी से प्राप्त होने वाली सीख और उद्देश्य पर चर्चा न करें बल्कि उसे बच्चों को ही खोजने और समझने का अवसर देना उचित होता है। कहानी परिचर्चा के संबंध में जानकारी देते हुए मंच के संयोजक शिक्षाविद प्रमोद दीक्षित मलय ने कहा कि आज समूह में प्रियंवद की श्मुन्ना बुनाईवालेश् और नेहा सिंह की श्जिसने पेरिस को बचायाश् कहानियों पर शिक्षकों के साथ संवाद किया गया। परिचर्चा की शुरुआत करते हुए बलराम गुप्त ने कहा कि भारत की ग्राम्य संस्कृति परंपरागत लोककलाओं से समृद्ध रही है। बुनाई, कुम्हारगिरी, हस्तकला आदि पर विकास के कारण छाये संकट को आधार बनाकर कहानीकार ने लोक कलाओं को बचाने एवं संरक्षण देने की पैरवी की है। माधुरी जायसवाल ने विचार रखे कि जब परिश्रम का उचित मूल्य नहीं मिलता तो नई पीढ़ी दूसरे व्यवसायों की ओर कदम बढ़ाने लगती है। राम किशोर पांडे ने कहा की लोक कलाओं के प्रति समर्पण, निष्ठा एवं इमानदारी होने पर ही वह जीवित रहती हैं। निशा सिंह के मत में मुन्ना बुनाई वाले कहानी के माध्यम से ग्राहक की संतुष्टि को महत्वपूर्ण मानकर कहानीकार ने पात्र के महान व्यक्तित्व का चित्र खींचा है। कमलेश त्रिपाठी ने पेरिस के सौंदर्य को कहानी के माध्यम से बच्चों तक पहुंचाने की अपील की। चंद्रशेखर सेन ने बुनाई वाले की मृत्यु के बाद उसके पुराने ग्राहकों के अधूरे कामों को पूरा करने के प्रति लिए गए संकल्प से संदेश देने की कोशिश की है कि नई पीढ़ी लोक विरासत को संभालने के लिए सजग है। आसिया फारूकी फतेहपुर ने कहा कि प्रायः बच्चे मां बाप को ओल्ड फैशन का मानते हुए उनके हुनर को आधुनिक संदर्भों में जोड़ नहीं पाते हैं। विनोद गुप्त ने कहा की कहानी पढ़कर बचपन के बहुत से चित्र स्मृति पटल पर अंकित हो गए हैं। राजेंद्र कौशांबी ने कहा जब हम किसी कला, वस्तु, व्यक्ति से प्रेम करने लगते हैं तो उसे नष्ट नहीं होने देते। सुरेंद्र कुमार इलाहाबाद ने कहा की कहानी का पात्र हमें एक बड़े संकट की ओर इशारा कर रहा है। आज की ऑनलाइन कहानी परिचर्चा में प्रदेश के 20 शिक्षक-शिक्षिकाओं ने सहभागिता की जिनमें अमिता शुक्ला, रीता गुप्ता, नवनीत शुक्ला, सपना कुशवाहा शामिल रहे। कार्यक्रम का संचालन प्रमोद दीक्षित मलय और आभार प्रदर्शन रामकिशोर पांडे ने किया। हिन्दुस्थान समाचार/अनिल/मोहित-hindusthansamachar.in