उप्र : कोरोना काल ने बदल दिया राजनीति का ढर्रा, सोशल मीडिया में भी गांव-गांव तक पहुंच बना चुकी है भाजपा
उप्र : कोरोना काल ने बदल दिया राजनीति का ढर्रा, सोशल मीडिया में भी गांव-गांव तक पहुंच बना चुकी है भाजपा
उत्तर-प्रदेश

उप्र : कोरोना काल ने बदल दिया राजनीति का ढर्रा, सोशल मीडिया में भी गांव-गांव तक पहुंच बना चुकी है भाजपा

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-प्रियंका वाड्रा ने लखनऊ आने की घोषणा कर भरा था कार्यकर्ताओं में जोश, लेकिन अब पार्टी में निराशा -कभी कार्यकर्ताओं के लिए आये दिन सड़क पर संघर्ष करने वाली सपा भी अब सिमटती जा रही सोशल मीडिया तक -बसपा भी एकांतवास में रहकर कर रही राजनीति, इन सबके बीच 'आप' की है उभरने की कोशिश लखनऊ, 07 सितम्बर (हि.स.)। कोरोना के कारण बदले परिवेश ने राजनीति करने का भी स्वरूप बदल गया है। अब पहले की अपेक्षा सोशल मीडिया की उपयोग राजनेता ज्यादा कर रहे हैं। यूपी में तो पूरा विपक्ष सिर्फ सोशल मीडिया तक ही सिमट कर रह गया है। पहले सोशल मीडिया से दूर रहने वालीं बसपा प्रमुख भी आजकल ट्विटर पर आये दिन प्रतिक्रिया देकर एकांतवास में रहते हुए राजनीति को जिंदा रखने में जुटी हुई हैं। वहीं भाजपा ने सोशल मीडिया में काफी बढ़त बनाये रखते हुए बूथ लेबल तक का वाट्सग्रुप बना लिया है। हर रोज इस पर आदेश-निर्देश के साथ ही सरकार के कार्यों का भी आदान-प्रदान करने में सफलतम प्रयास में सबसे आगे है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में देखे तो इस वर्ष के शुरू में कांग्रेस की महासचिव व प्रदेश प्रभारी प्रियंका गांधी वाड्रा की लखनऊ में स्थायी रूप से रहने की संभावना जताई जा रही थी। उनके लिए आवास का भी चयन हो गया था। उस समय कांग्रेस कार्यकर्ताओं में काफी जोश था। ऐसा लग रहा था कि यूपी की राजनीति में कोमा में जा चुकी कांग्रेस को ऑक्सीजन देने में प्रियंका वाड्रा सफल रहेंगी। लेकिन, यहां स्थायी रूप से आने से पूर्व ही उन्होंने आने का प्लान बदल दिया। बताया जाता है कि इसका कारण यूपी पदाधिकारियों की आपसी कलह रहा। कांग्रेस में पहले तो था उत्साह, लेकिन अब पड़ गया ठंडा अब वे सिर्फ ट्विटर के माध्यम से आये दिन यूपी और केन्द्र सरकार के खिलाफ अपनी प्रतिक्रिया देती रहती हैं। लेकिन, इससे उनके कार्यकर्ताओं में काफी निराशा है। इस संबंध में वरिष्ठ पत्रकार पंकज पांडेय का कहना है कि यूपी की राजनीति में सोशल मीडिया से काम नहीं चल सकता। यहां पर वही नेता सफल होता है, जो जमीन से जुड़कर लोगों की छोटी-छोटी समस्याओं का समाधान कराए और उसको मुद्दा बनाकर उसके लिए सड़क पर उतरे। कांग्रेस में पहले तो उत्साह दिखा। लेकिन, इस बीच कुछ ठंडा पड़ गया है। हल्लाबोल के लिए विख्यात सपा भी सिमटती जा रही सोशल मीडिया तक वहीं समाजवादी पार्टी की राजनीति को देखें तो पहले हल्ला बोल के लिये विख्यात पार्टी के मुखिया ही सिर्फ ट्विटर तक सीमित रह गये हैं। इस संबंध में राजनीतिक विश्लेषक राजीव रंजन सिंह का कहना है कि किसी पार्टी का यदि मूल स्वभाव में बदलाव आने लगे तो पार्टी के लिए बहुत कठिन दौर आ जाता है, क्योंकि पहले से उस विचार से जुड़े कार्यकर्ता उससे बिदकने लगते हैं। समाजवादी पार्टी जनहित या अपने लोगों के लिए सड़कों पर खून-खराबा तक उतर जाने के लिए उतारू रहने के लिए जानी जाती थी। कार्यकर्ता भी हमेशा पार्टी में रहकर अपने को महफूज महसूस करता था। लेकिन, अब ऐसा नहीं रह गया है। कोरोना काल में तो पार्टी मुखिया ने बिल्कुल ही अपने को ट्वीटर पर प्रतिक्रिया देने तक सीमित कर लिया है। इससे कार्यकर्ताओं में कुछ निराशा जरूर है। लेकिन, विपक्ष में अब भी सबसे ज्यादा ठीक स्थिति में समाजवादी पार्टी ही है। पहले से ही सोशल मीडिया पर सक्रिया भाजपा, सभी दलों से आगे वहीं इन सबके बीच भाजपा का देखें तो कोरोना काल से पहले भी भाजपा ने सोशल मीडिया का भरपुर प्रयोग किया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सोशल मीडिया के महत्व को समझा और अपने पहले चुनाव में ही इसको पूरे जोश के साथ कार्यकर्ताओं तक अपनी बात को पहुंचाने के लिए प्रयोग में लाये। कोरोना काल में तो बूथ लेबल तक वाट्सएप ग्रुप बन चुके हैं। इससे सरकार व संगठन की बात त्वरित गति से गांव स्तर के कार्यकर्ताओं तक तुरंत पहुंचती है। बूथ स्तर के कार्यकर्ता इन बातों को बातों ही बातों में अपने गांव के दूसरे लोगों तक पहुंचाने का काम करते हैं। साथ ही यदि कोई विपक्ष का कार्यकर्ता कोई बात उठाता है, तो भाजपा कार्यकर्ताओं के पास जुबान पर उनकी बातों का तार्किक काट होता है। इस लिहाज से भाजपा इस मामले में विपक्ष को काफी पीछे छोड़ते हुए घर-घर तक अपनी पहुंच बना चुकी है। सोशल मीडिया पर सक्रियता दिखाने की कोशिश में बसपा यदि बात बसपा की करें तो वह पहले कभी भी सोशल मीडिया पर नहीं रही। लेकिन, अब वह भी इसमें उतर आयी है। बसपा प्रमुख मायावती भी अब ट्विटर पर आये दिन कमेंट कर सत्ता पक्ष को अपनी उपस्थिति का एहसास कराती हैं। लेकिन, अभी बसपा में उतनी दमदारी देखने को नहीं मिल रही है। जमीनी स्तर पर भी कोरोना काल में बसपा की राजनीति पिछड़ती दिख रही है। 'आप' भी राजनीति में दमदारी पेश करने की है फिराक में इस बीच आम आदमी पार्टी ने संजय सिंह को यूपी का प्रभारी बनाकर आप के पक्ष में कुछ राजनीति का गर्माने का प्रयास किया है। नि:संदेह इस बीच कई बार आप ने सुर्खियां भी बटोरी। लेकिन, अभी तक वह जमीनी कार्यकर्ताओं तक पहुंच बनाने से दूर दिख रही है, हालांकि यही स्थिति रही तो आप भी यूपी की राजनीति में दमदारी पेश कर सकती है। हिन्दुस्थान समाचार/उपेन्द्र/संजय-hindusthansamachar.in