आत्महत्या नहीं है जीवन का अंतिम समाधान, घबराहट और अवसाद को न होने दें हावी
आत्महत्या नहीं है जीवन का अंतिम समाधान, घबराहट और अवसाद को न होने दें हावी
उत्तर-प्रदेश

आत्महत्या नहीं है जीवन का अंतिम समाधान, घबराहट और अवसाद को न होने दें हावी

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- नौकरी चले जाने का भय, आर्थिक बोझ और भविष्य को लेकर बढ़ रही निराशा - वेबिनार में विशेषज्ञों ने दिया टिप्स,बोले टॉक थेरेपी माध्यम जरूरी वाराणसी, 12 सितम्बर (हि.स.)। वैश्विक महामारी कोरोना काल के लम्बा खिंचने पर लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर पड़ रहा है। लोगों में इससे घबराहट और अवसाद बढ़ रहा है। जिसके चलते आत्महत्या जैसी प्रवृत्ति बढ़ रही है। ये उद्गार प्रो० जय सिंह यादव के है। प्रो. यादव विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस पर शनिवार शाम को सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर एडोलसेंट हेल्थ एंड डेवलपमेंट, एस. एस. हॉस्पिटल, बी.एच.यू. द्वारा आयोजित ऑनलाइन वेबिनार को सम्बोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि वैश्विक महामारी के कारण नौकरी चले जाने का भय, आर्थिक बोझ और भविष्य को लेकर अनिश्चितता जैसी चीजों से लोग भय महसूस कर रहे हैं। भोजन एवं अन्य ज़रूरी सामानों के खत्म हो जाने का डर भी इन चिंताओं को और बढ़ा देता है। उन्होंने चेताते हुए कहा कि बिगड़ती स्थितियों के कारण मानसिक स्वास्थ्य की समस्या और गंभीर हो सकती है। जिससे आत्महत्या करने की प्रवृत्ति भी बढ़ सकती है। नोडल ऑफिसर प्रोफेसर डॉ. मधु जैन ने बताया कि 15 से 20 साल के बच्चे भी आत्महत्या कर रहे हैं। आत्महत्या समाज में एक कलंक के रूप में देखा जाता था पर अब नहीं है। सलाह और निवारण ही इसका उपचार है। डॉक्टर समीक्षा कौर ने बताया कि समाज या परिवार द्वारा किसी व्यक्ति की भावनाओं को न समझ पाना उस व्यक्ति के अवसाद का कारण बन जाता है। उन्होंने आत्म हत्या को रोकने के लिए परिवार और समाज का सहयोग पर जोर दिया। अधिवक्ता जागृति सिंह ने मेंटल हेल्थ एक्ट 2017 के बारे में बताया और राष्ट्रीय स्तर के कुछ आंकड़ों को प्रस्तुत किया। रजनीश गुप्ता ने बताया कि टॉक थेरेपी के माध्यम से हम आत्महत्या की प्रवृत्ति को काफी हद तक नियंत्रित कर सकते हैं। परिवार के सदस्यों, दोस्तों, रिश्तेदारों से अपने मन की बातों को बताना भी एक प्रकार का समस्या का समाधान है। डॉ प्रवेश द्विवेदी ने बताया कि सामान्य व्यक्ति का भी व्यवहार एकाएक बदल सकता है, जो उसे आत्महत्या की तरफ ले जाता है ऐसे व्यक्ति या मरीज पर भी ध्यान देने की जरूरत है। विशेषज्ञ आकृति ने बताया कि आत्महत्या का इतिहास बहुत ही पुराना है, चिंताजनक संकेतों पर ध्यान देने की जरूरत होती है जैसे हथियार रखना, जहर खाने की कोशिश इसके उदाहरण है। और साइकोलॉजिकल थेरेपी ही इसका इलाज है। गोष्ठी में शिव प्रकाश,कुलजीत कौर, डॉक्टर सुनील पांडेय और प्रोफेसर रतन कुमार श्रीवास्तव ने मानसिक स्वास्थ्य एवं आत्म-हत्या के रोकथाम एवं स्वस्थ जीवन शैली में गुस्सा, चिढ़चिढ़ापन इत्यादि मानसिक बीमारी के बारे में जानकारी दिया। धन्यवाद् ज्ञापन आकांक्षा ने किया। हिन्दुस्थान समाचार/श्रीधर/राजेश-hindusthansamachar.in