आचार्य द्विवेदी के निबन्ध मनुष्यता की अविराम यात्रा है : डा श्रीराम परिहार
आचार्य द्विवेदी के निबन्ध मनुष्यता की अविराम यात्रा है : डा श्रीराम परिहार
उत्तर-प्रदेश

आचार्य द्विवेदी के निबन्ध मनुष्यता की अविराम यात्रा है : डा श्रीराम परिहार

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-उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान ने आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी स्मृति समारोह का आयोजन कराया लखनऊ, 31 अक्टूबर (हि.स.)। उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी स्मृति समारोह का आयोजन गूगल मीट के माध्यम से शनिवार को किया गया। संगोष्ठी की अध्यक्षता डाॅ. सदानन्दप्रसाद गुप्त, कार्यकारी अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा की गयी। डाॅ. श्रीराम परिहार, खंडवा ने कहा कि डाॅ. द्विवेदी का गहन अध्ययन, चिंतन, भारतीय संस्कृति, इतिहास, धर्म, दर्शन में स्पष्टतः परिलक्षित होता है। आचार्य द्विवेदी के निबन्ध मनुष्यता की अविराम यात्रा है। आचार्य द्विवेदी के ललित निबन्धों में मनुष्य की जय यात्रा को वाणी मिलती है। उन्होेंने परम्परा का पुर्नआख्यान किया है। वे आश्रम संस्कृति का निर्माण अपने निबन्धों में करते हैं। आचार्य द्विवेदी साहित्य का मनुष्य का सहज विश्वास मानते हैं। वे परम्परा के भीतर से संवेदना के सूत्रा ग्रहण करते हैं। सम्मानित अतिथि के रूप में उपस्थित डाॅ. सुधीर प्रताप सिंह ने कहा कि आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का आचार्य शुक्ल से कोई प्रत्यक्ष विरोध नहीं था। उनके दृष्टिकोण में अन्तर था। आचार्य द्विवेदी के व्यक्तित्व की निर्मिती में विरोधाभास भी दिखायी देता है। द्विवेदी जी की आलोचना दृष्टि को हम एक सूत्र में नहीं रख सकते। डाॅ. सिद्धार्थ शंकर ने कहा कि आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के बाणभट्ट की आत्मकथा उपन्यास से उपन्यासकार के रूप में पहचान मिली। चारुचन्द्र लेख और पुनर्नवा को ऐतिहासिक उपन्यास की श्रेणी में रखा जाता है। उन्होेंने अपने उपन्यासों को गल्प कहा। उन्होंने ऐतिहासिक संदर्भ को वर्तमान परिवेश से जोड़ने का सफल प्रयास किया। वे ऐतिहासिक जय यात्रा को जन सामान्य से आचार्य द्विवेदी के साहित्य चिन्तन में परम्परा और आधुनिकता का समन्वय देखने को मिलता है। डाॅ. जयप्रकाश ने आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी से जुड़े संस्मरण सुनाते हुए उनके सरल सहज व्यक्तित्व की चर्चा की। वे व्यक्ति के रूप में मानवतावादी थे और साहित्य में मानवादी। उनके व्यक्तित्व में मानवतावाद आर्ष ग्रंथों से आया। द्विवेदी जी कवि स्वभाव थे वे मन से अधिक उदार थे। द्विवेदी जी को अट्टहास प्रसिद्ध था। वे प्रायः यात्राओं पर रहते थे। द्विवेदी जी के दन्तोड़ छन्द की चर्चा काफी समय तक चलती रही। अध्यक्षीय सम्बोधन में डाॅ. सदानन्द प्रसाद गुप्त, मा. कार्यकारी अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान ने कहा कि हमारे लिए सौभाग्य की बात है कि आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसा विराट व्यक्तित्व हिन्दी संस्थान की स्थापना के समय से जुड़े कार्यकारी उपाध्यक्ष के रूप में जुड़े। द्विवेदी जी भारतीय परम्परा में संलग्न रचनाकार थे। द्विवेदी जी सारे संसार का एक मानव धर्म मानते थे। संस्कृति, अपभ्रंश, प्राकृत के साहित्य का प्रभाव उनकी रचनाओं में देखने को मिलता है। वे अपनी परम्परा पर गर्व करते थे। द्विवेदी जी के निबन्धों में भारतेन्दु से प्रारम्भ हुई परम्परा का विकास दिखायी देता है। द्विवेदी जी का मानना था कि निबन्धों में विचार तत्व होते हैं। अभ्यागतों का स्वागत श्रीकांन्त मिश्रा, निदेशक, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा किया गया तथा संचालन डाॅ. अमिता दुबे, सम्पादक, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान ने किया। हिन्दुस्थान समाचार/उपेन्द्र-hindusthansamachar.in