अगत्स्य मुनि के इंतजार में आज भी साष्टांग प्रणाम मुद्रा में विंध्य पर्वत
अगत्स्य मुनि के इंतजार में आज भी साष्टांग प्रणाम मुद्रा में विंध्य पर्वत
उत्तर-प्रदेश

अगत्स्य मुनि के इंतजार में आज भी साष्टांग प्रणाम मुद्रा में विंध्य पर्वत

news

मीरजापुर, 16 अक्टूबर (हि.स.)। अपने महात्म्य के कारण ही विंध्य क्षेत्र कालांतर से साधू-संतों ही नहीं अपितु देवताओं की भी तपोस्थली रही है। इसकी उत्पत्ति पृथ्वी की उत्पत्ति के साथ ही मानी गई है, जिसका वर्णन वेदों व पुराणों में मिलता है। पौराणिक कथाओें के अनुसार एक बार विंध्य पर्वत ने सूर्य से सुमेरू पर्वत की भांति अपनी परिक्रमा करने को कहा। लेकिन ऐसा कर पाने में सूर्य ने अपनी असमर्थता जताई। इससे विंध्य पर्वत क्रोधित होकर सूर्य की राह को बाधित करने के लिए अपने आकार में वृद्धि करना आरम्भ कर दिया। विन्ध्य पर्वत के बढ़ते आकार से सूर्य के मार्ग में रूकावट उत्पन्न होने लगी। इससे देवताओं सहित भूलोक के सम्पूर्ण जीव-जन्तुओं व मनुष्यों को कष्ट होने लगा। सभी देवता व ऋषि-मुनि विन्ध्य पर्वत से अपने बढ़ते आकार को रोकने लिए अनुनय-विनय करने लगे। परन्तु विन्ध्य पर्वत नहीं माना। सभी ऋषि-मुनि व देवतागण निराशभाव से विन्ध्य पर्वत के गुरू महर्षि अगत्स्य के पास पहुंचे और विन्ध्य पर्वत को रोकने की प्रार्थना की। अगत्स्य मुनि विन्ध्य पर्वत के पास गए। अपने गुरू को आया देख विन्ध्य पर्वत ने आदरपूर्वक झुककर गुरू को साष्टांग प्रणाम किया। प्रणाम कर विन्ध्य पर्वत उठ पाता, इससे पूर्व ही अगत्स्य बोल पड़े, जब तक मैं पुनः लौटकर न आऊं मेरी प्रतिक्षा करना। लेकिन अगत्सय लौटकर नहीं आए। कहते हैं, तब से विन्ध्य पर्वत साष्टांग प्रणाम की मुद्रा में आज तक प्रतिक्षारत है। हिन्दुस्थान समाचार/गिरजा शंकर/विद्या कान्त-hindusthansamachar.in