‘मेरे अमेरिकन बहिनों और भाइयों’ बोलकर नारी सम्मान को भी किया स्थापित विवेकानंद ने
‘मेरे अमेरिकन बहिनों और भाइयों’ बोलकर नारी सम्मान को भी किया स्थापित विवेकानंद ने
राजस्थान

‘मेरे अमेरिकन बहिनों और भाइयों’ बोलकर नारी सम्मान को भी किया स्थापित विवेकानंद ने

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उदयपुर, 10 सितम्बर (हि.स.)। स्वामी विवेकानंद ने ‘मेरे अमेरिकन बहिनों और भाइयों’ बोलकर भारत की सनातन संस्कृति के मान को विश्व पटल पर स्थापित किया, बल्कि बहिन शब्द पहले रखकर यह भी दर्शाया कि भारतीय संस्कृति में नारी का सम्मान सर्वोपरि है। यहां कहा गया है ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यंते, रमंते तत्र देवता:’। यह बात गुरुवार को यहां विश्व संवाद केन्द्र चित्तौड़ प्रांत की ओर से आयोजित फेसबुक संवाद में गुरुग्राम विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. मार्कण्डेय आहूजा ने कही। स्वामी विवेकानंद के शिकागो भाषण 11 सितम्बर के 127वें वर्ष की स्मृति में ‘स्वामी विवेकानंद जीवन दर्शन’ विषय पर फेसबुक लाइव का आयोजन किया गया। इसके मुख्य वक्ता कुलपति डॉ. आहूजा रहे। डॉ. आहूजा ने कुछ ही समय पूर्व पुस्तक लिखी है जिसका शीर्षक ‘जीवन प्रबन्धन और स्वामी विवेकानंद’ है। डॉ. आहूजा ने स्वामी विवेकानंद के शिकागो भाषण एवं उनके जीवन दर्शन पर विस्तृत प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि विवेकानन्द प्रेरणा हैं युवाओं के लिए, विवेकानंद प्रतीक हैं स्वाभिमान के, संकल्प हैं विश्व शांति के लिए। शिकागो में उस महान दार्शनिक संत ने 11 सितम्बर 1893 को लोगों के समक्ष जो विचार रखे उनसे पूरी दुनिया में भारत की और देखने की दृष्टि को ही बदल के रख दिया। बोलने से पूर्व जब स्वामी विवेकानंद के होंठ थर्राए, आंसू आये फिर गुरुजी को स्मरण किया और बोले ‘मेरे अमेरिकन बहिनों और भाइयों’। लोगों ने उनको इस भाषण के बाद उनको देवदूत संत की संज्ञा दी। स्वामी विवेकानंद ने बहिनों को पहले रख नारी वंदन किया। उन्होंने बताया कि जहां नारी की पूजा होती हैं, वहां देवता निवास करते हैं। उन्होंने बताया कि ब्रह्मचर्य, अभ्यास, तपस्या व एकाग्रता से असम्भव को संभव किया जा सकता है। डॉ. आहूजा ने कहा कि हम सबके अंदर सुप्त शक्तियां हैं, शिक्षा का उद्देश्य इन सुप्त शक्तियों को जागृत करना है। नई शिक्षा नीति 2020 स्वामी विवेकानंद के उद्देश्य पूरे करने को सहायक होगी। हम सबके अंदर भी वही शक्ति है। उन्होंने भारतीय वेदांत से संसार को दर्शन कराया व धर्म ध्वजा पूरे संसार में फहराई। स्वामी विवेकानंद ने कहा कि अपने अंदर दान की प्रवृत्ति जाग्रत करो। उन्होंने सच को पहल दी, नारी उत्थान, नारी शिक्षा को आवश्यक बताया। स्वामी विवेकानंद ज्ञान के भंडार थे। स्वामी विवेकानंद ने खेल-खेल में राष्ट्रीयता जाग्रत करने पर बल दिया। उनमें राष्ट्रीयता कूट-कूट कर भरी थी। परहित की भावना से वे ओतप्रोत थे। डॉ. आहूजा ने कहा कि स्वामी विवेकानंद के जीवन को पढ़ लें तो पूरे भारत के विचारों को जान सकते हैं। वे छोटी सी उम्मीद पर भी चल पड़ते थे। वे उत्तम सम्बन्ध निर्माता थे। उन्होंने राष्ट्र को नीचे कभी नहीं होने दिया। दुनिया को निचोडऩे की नहीं, देने की आवश्यकता को बताया। उन्होंने अपने आप पर नियंत्रण करना सिखाया। उनकी यात्रा सगुण से निर्गुण की थी। स्वामी विवेकानंद ने सामाजिक समरसता को संस्कृति का आधार बताया। उन्होंने लौटकर कहा, मैं भारत से प्रेम नहीं पूजा करता हूं। उन्होंने अपना छोटा जीवन मातृभूमि को, हिंदुत्व को अर्पित किया। हिन्दुस्थान समाचार/सुनीता कौशल/संदीप-hindusthansamachar.in