मुख्यमंत्री ने लेसर फ्लोरिकन के कुनबे में बढोतरी पर जताई खुशी
मुख्यमंत्री ने लेसर फ्लोरिकन के कुनबे में बढोतरी पर जताई खुशी
राजस्थान

मुख्यमंत्री ने लेसर फ्लोरिकन के कुनबे में बढोतरी पर जताई खुशी

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जयपुर, 10 सितम्बर (हि.स.)। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अजमेर जिले के नसीराबाद में लेसर फ्लोरिकन यानी खरमोर के कुनबे में बढोतरी पर खुशी जताई है। मुख्यमंत्री ने गुरुवार को टवीट कर खरमोर के संरक्षण के प्रयासों मे मिली सफलता के लिए डब्ल्यूआईआई, बीएनएचएस, वन विभाग और स्थानीय पीपीएल के संयुक्त प्रयासों की सराहना की। मुख्यमंत्री गहलोत ने अपने टवीट में लिखा कि नसीराबाद के पास एक अस्थायी आवास में लेसर फ्लोरिकन के दो चूजों का सफलतापूर्वक प्रजनन हुआ हैं। यह लेसर फ्लोरिकन के संरक्षण प्रजनन के प्रयास का हिस्सा है। इस सफलता के लिए डब्ल्यूआईआई, बीएनएचएस, वन विभाग और स्थानीय पीपीएल के संयुक्त प्रयासों के लिए मेरी प्रशंसा। भारतीय वन्यजीव संस्थान देहरादून की रिपोर्ट बताती है कि कभी भारत के बड़े हिस्से में पाए जाने वाले खरमोर की आबादी अब सिर्फ चार राज्यों में सिमटकर रह गई है। इसलिए नसीराबाद से आई यह खबर सुखद है। सर्वे में बताया गया कि वर्ष 2000 में खरमोर की संख्या 3500 के लगभग थी, लेकिन कुछ वर्षों के भीतर ही इसकी 80 फीसदी के लगभग आबादी समाप्त हो गई। क्या है लेसर फ्लोरिकन लेसर फ्लोरिकन या खरमोर भारत में पाए जाने वाले बस्टर्ड प्रजाति के पक्षियों में से एक है। खरमोर की आबादी समाप्त होने के पीछे कई कारणों को जिम्मेदार माना जाता है। एक तो खाने के लिए इस पक्षी का जमकर शिकार किया गया। फिर खेती में कीटनाशकों के अत्यधिक प्रयोग के चलते कीटों की संख्या बेहद कम होती जा रही है। इसके चलते पक्षी के सामने पेट भरने की समस्या पैदा हो गई है। यह घसियाले मैदानों में रहने वाला पक्षी है और इसके रहवास में ज्यादा से ज्यादा अब खेती होने लगी है। इससे इस पक्षी को रहने के लिए जगह नहीं मिल रही है। घसियाले मैदानों में जमीन पर ही यह अपने घोसले बनाता है। लेकिन, आवारा कुत्ते अब उन घोसलों को नष्ट कर देते हैं या उनके चूजों का शिकार कर लेते हैं। अजमेर में हो रहा संरक्षण तेजी से विलुप्त होते इस पक्षी को बचाने के लिए खासतौर पर राजस्थान के अजमेर और आसपास के जिलों में अलग-अलग प्रयास शुरू किए गए हैं। संरक्षण के इन्हीं प्रयासों से जुड़े विशेषज्ञ बताते हैं कि अजमेर, भीलवाड़ा और टोक में खरमोर देखे जा रहे हैं। मानसून के सीजन में यह पक्षी सौ से डेढ़ सौ किलोमीटर तक की दूरी में प्रवास के लिए जाता है। घसियाले मैदानों के कम होने, वहां पर आवाजाही बढ़ने, हाईटेंशन लाइन आदि कारणों से इन्हें प्रवास में भी दिक्कत आ रही है। ज्वार, बाजरा, चना और उड़द जैसी फसलों के बीच भी ये अपना घोसला बना लेते हैं। हिन्दुस्थान समाचार/रोहित/ ईश्वर-hindusthansamachar.in