मतांतरण करने पर एससी की तरह एसटी का आरक्षण भी समाप्त करने के प्रावधान की मांग - जनजाति सुरक्षा मंच
मतांतरण करने पर एससी की तरह एसटी का आरक्षण भी समाप्त करने के प्रावधान की मांग - जनजाति सुरक्षा मंच
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मतांतरण करने पर एससी की तरह एसटी का आरक्षण भी समाप्त करने के प्रावधान की मांग - जनजाति सुरक्षा मंच

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उदयपुर, 05 नवम्बर (हि.स.)। जनजाति सुरक्षा मंच उदयपुर ने मतांतरित जनजातियों को अनुसूचित जनजाति से हटाकर उन्हें प्रदत्त आरक्षण का लाभ समाप्त करने की मांग की है। मंच के पदाधिकारियों ने गुरुवार को जिला कलेक्टर को प्रधानमंत्री के नाम ज्ञापन देकर यह मांग की। मंच के संयोजक अम्बालाल ने बताया कि मतान्तरित जनजातियों को आरक्षण सुविधा दिये जाने के विरुद्ध तत्कालीन बिहार (वर्तमान झारखण्ड) के जनजाति नेता एवं लोकसभा सदस्य व केंद्रीय मंत्री स्व. कार्तिक उरांव द्वारा तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को 1970 में एक आवेदन दिया गया था। इस बात को 50 वर्ष हो चुके हैं। जनजाति समाज की अवस्था को देखकर उन्हें जो पीड़ा हुई उसे व्यक्त करने के लिए उनके द्वारा ‘‘20 वर्ष की काली रात’’ नामक पुस्तिका भी लिखी गई थी। उस आवेदन को न लोकसभा के पटल पर रखा गया था, न ही उसको खारिज किया गया था, बल्कि उसको ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। 348 लोकसभा सदस्यों के हस्ताक्षरों से युक्त उस आवेदन के सम्बन्ध में गुरुवार को स्व. कार्तिक उरांव के जन्म दिवस के अवसर पर सरकार को पुनः याद दिलाना जरूरी हो गया है। वह आवेदन 1967 के अनुसूचित जाति-जनजाति आदेश (संशोधन) विधेयक की जे.पी.सी. की अनुशंसा के समर्थन में किया गया था तथा इसमें इस तरह से संशोधन का प्रस्ताव रखा गया कि जिसने जनजाति आदिमत तथा विश्वासों का परित्याग कर दिया हो और ईसाई या इस्लाम धर्म ग्रहण कर लिया हो वह अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं समझा जायेगा। इससे पूर्व 1950 में एक संशोधन अनुसूचित जातियों (एससी) के सम्बन्ध में किया जा चुका था जिसमें यही अंकित किया गया था कि कोई भी व्यक्ति सिख या हिन्दू धर्म को छोड़कर अन्य कोई धर्म ग्रहण करता हो वह अनुसूचित जाति का नहीं समझा जायेगा। भारतीय अधिनियम 1935 के अंतर्गत भारतीय ईसाई की परिभाषा में यह कहा गया है कि भारतीय ईसाई वह होगा जो कोई भी ईसाई पंथ को मानता हो और यूरोपीय या आंगलो - इंडियन न हो। इसके अनुसार अनुसूचित जनजाति से जब एक व्यक्ति ईसाई धर्म में धर्मांतरित हो जाता है वह स्वाभाविक रूप से भारतीय ईसाई की श्रेणी में आएगा। अतः उसको किसी भी प्रकार की आरक्षण की सुविधा देना असंवैधानिक माना जायेगा। मंच के संयोजक अम्बालाल ने बताया कि वास्तविक जनजातियों के साथ हो रहे इस अन्याय के खिलाफ जनजाति सुरक्षा मंच वर्षों से आवाज उठा रहा है। अभी तक बहुत सी सुविधाओं का उपभोग धर्मांतरित लोगों द्वारा किया जाता रहा है जो आर्थिक और शैक्षणिक दृष्टि से वास्तविक जनजातियों से तुलना में काफी अच्छी स्थिति में हैं। जनजाति सुरक्षा मंच यह मांग करता है कि काफी विलंब हो चुकने के बावजूद यह संशोधन करना जरूरी है। इस संबंध में जनमत संग्रह करने के लिए जनजाति सुरक्षा मंच ने 2015 में एक हस्ताक्षर अभियान चलाया था जिसमें देशभर के 18 वर्ष ऊपर के आयुवाले 27.67 लाख जनजाति लोगों ने हस्ताक्षर किए थे। जनजाति समाज के अग्र स्व. जगदेव राम उरांव, स्व. दिलीप सिंह भूरिया एवं अनुसुईया (तत्कालीन राज्यसभा सदस्य एवं वर्तमान छत्तीसगढ़ राज्यपाल) के नेतृत्व में देशभर के जनजाति नेताओं के एक प्रतिनिधिमंडल ने तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा देवीसिंह पाटिल को मिलकर यह जनमत संग्रह सौपा था, लेकिन इस पर आज तक कोई ध्यान नहीं दिया गया। हाल ही में लोकसभा में भी एक सदस्य ने इस विषय को उठाया है। मंच ने केन्द्र सरकार से इस दिशा में जल्द से जल्द ठोस कदम उठाने की मांग की है। ज्ञापन देने के दौरान मंच के पदाधिकारी उपस्थित थे। हिन्दुस्थान समाचार/सुनीता कौशल / ईश्वर-hindusthansamachar.in