भारत के इतिहास में मेवाड़ की उपस्थिति हड़प्पा के पहले से - डॉ. ललित पाण्डे
भारत के इतिहास में मेवाड़ की उपस्थिति हड़प्पा के पहले से - डॉ. ललित पाण्डे
राजस्थान

भारत के इतिहास में मेवाड़ की उपस्थिति हड़प्पा के पहले से - डॉ. ललित पाण्डे

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उदयपुर, 07 सितम्बर (हि.स.)। विश्व के सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में गणना की जाने वाली अरावली की प्राकृतिक द्रोणी में बसा मेवाड़ और उसकी संस्कृति दोनों ही अपने भौतिक स्वरूप के समान पुरानी है। पुरातत्व की गवेषणाओं ने इस तथ्य को आधार प्रदान किया और लोक श्रुति ने इसे ऐतिहासिक स्वरूप में संजोया। यह विचार इतिहास संकलन समिति चित्तौड़ प्रांत की ओर से आयोजित व्याख्यानमाला ‘मेवाड़ अतीत से वर्तमान तक’ के द्वितीय सत्र के मुख्य वक्ता डॉ. ललित पाण्डे ने रखे। वहीं प्रथम सत्र में मुख्य वक्ता जर्नादनराय नागर विद्यापीठ विश्वविद्यालय के साहित्य संस्थान के निदेशक व पुरातत्वविद डॉ. जीवनसिंह खरकवाल ने शोधार्थियों को पुरातत्व से रूबरू करवाया। उन्होंने कहा कि मेवाड़ और अरावली की द्रोणी में मानव का आवास प्रस्तर युग से बना हुआ है। यहां पर प्रस्तर युग के गुहाचित्र से लेकर नगरों की बसावट के आरम्भ होने तक के काल के व्यवस्थित प्रमाण मिलते हैं। इसके साथ नगरीय बसावट और ताम्र कास्य युगीन संस्कृतियों के अवशेष भी खुदाई से लगातार प्राप्त हुए हैं। प्रथम सत्र को सम्बोधित करते हुए डॉ. जीवन खरकवाल ने कहा कि विगत साठ, सत्तर वर्षों में मेवाड़ में हुई खुदाइयों में पता चला है कि बनास के अपवाह तंत्र में बेड़च, गम्भीरी, वाकल और करमाली जैसी नदियों के किनारे एक व्यवस्थित नगरीय सभ्यता का विकास हुआ। इसमें कांस्य युग की आहड़ संस्कृति अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इसका विकास हड़प्पा जैसे नगर के समानान्तर हुआ। कार्यक्रम के दूसरे सत्र के मुख्य वक्ता जर्नादनराय नागर विद्यापीठ विश्वविद्यालय के साहित्य संस्थान के पूर्व निदेशक और पुरातत्वविद डॉ. ललित पाण्डे ने कहा कि भारत के इतिहास को जानने के लिए राजस्थान और राजस्थान में मेवाड़ के इतिहास को जानना आवश्यक है। इसको दृष्टिगत रखते हुए मेवाड़ के प्रारंभिक इतिहास को जानने के साधनों को समझना आवश्यक हो जाता है। मेवाड़ के प्रारंभिक इतिहास को जानने के.लिए प्रचुर साहित्यिक और पुरातात्विक स्रोत उपलब्ध है। साहित्यिक दृष्टि से उत्तर वैदिक कालीन साहित्य में बोधायन धर्मसूत्र एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है। इसके साथ ही रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्य, पंतजलि महाभाष्य, वायु पुराण के अलावा तारानाथ लामा जैसे बौद्ध विद्वान भी राजस्थान और मेवाड़ इतिहास को.समझने के लिए प्रमुख स्रोत हैं। इसके अलावा आहाड़, बालाथल, गिलूण्ड, ईसवाल आदि पुरास्थलों से प्राप्त सामग्री भी यह बताती है कि यह भू-भाग आदिकाल से ही मानव की पसंदीदा जगह रही है। मेवाड़ धातु विज्ञान की जननी ताम्र (तांबा) के धातु के प्रसंस्करण के लिए प्रमुख स्थल रहा है। शायद हड़प्पा की ताम्रकांस्य युगीन जीवन शैली के विकास में भी आहड़ और मेवाड़ का विशेष स्थल रहा है। भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद दिल्ली के निदेशक और कार्यक्रम के मुख्य अतिथि ओम उपाध्याय ने कहा कि मेवाड़ के तांबा उत्पादक होने के कारण ही इसे हड़प्पा से भी पूर्व संस्कृति का स्थान माना जाना चाहिए। इतिहास संकलन योजना के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रो. कृष्ण स्वरूप गुप्ता ने धन्यवाद ज्ञापित किया। सत्रों के प्रारम्भ में इतिहास संकलन समिति चित्तौड़ प्रांत के अध्यक्ष मोहनलाल साहू ने अतिथियों का परिचय करवाया। क्षेत्रीय संगठन मंत्री छगनलाल बोहर, उदयपुर जिला मंत्री चैनशंकर दशोरा, कार्यक्रम समन्वयक मनीष श्रीमाली और अन्य कार्यक्रम में उपस्थित रहे। हिन्दुस्थान समाचार/सुनीता कौशल-hindusthansamachar.in