मरीजों के लिए युवा डॉक्टर बना मैकेनिक,पाना, पेंचकस, प्लास रखकर रखते थे ध्यान

मरीजों के लिए युवा डॉक्टर बना मैकेनिक,पाना, पेंचकस, प्लास रखकर रखते थे ध्यान
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अनूपपुर, 11 जून (हि.स.)। कोरोना की दूसरी लहर में मरीजों के बीच कायम मानवीय संवेदना एवं सामाजिक सरोकार के गहरे रिश्ते ने युवा डॉक्टर को डॉक्टर धर्म निभाने हेतु मरीजों के जीवन की चिंता में मैकेनिक तक बना डाला। जिस तेजी से कोरोना के मामले बढ़े, उससे यह बीमारी चुनौती बनकर सामने आई और विषम परिस्थितियों में भी मरीजों की जान बचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। डॉ. प्रवीण कुमार शर्मा बताते हैं कि कोरोना की दूसरी लहर से जंग के लिए तैनाती जिला चिकित्सलय के कोविड आइसोलेशन के आईसीयू में कर दी गई थी। कोरोना के गंभीर मरीजों का इलाज, नर्सिंग स्टेशन बनाना, आईसीयू सेटअप स्थापित करना, 24 घंटे ऑक्सीजन सप्लाई, बिजली की सतत आपूर्ति, पानी, साफ-सफाई व्यवस्था के लिए चुनौतियां थीं। उस समय वहां ऑक्सीजन के 40 बेड और 541 मरीज थे, लेकिन इसकी क्षमता को बढ़ाकर 80 ऑक्सीजन बेड कर दिया गया। यहां बहुत खराब हालत वाले मरीज भर्ती होते थे, जिनके जीवन को बचाने के लिए उन्हें लगातार ऑक्सीजन देना जरूरी था। डॉ. शर्मा ने बताया कि हमेशा इस बात की चिंता रहती थी कि कहीं ऑक्सीजन सप्लाई बाधित ना हो जाए। इसलिए ऑक्सीजन का प्रेशर जरूरत के हिसाब से बढ़ाने-घटाने के लिए फ्लोमीटर के लूज हो जाने की संभावना को देखते हुए वह अपने पास हमेशा पाना, पेंचकस, प्लास रखे रहते थे, ताकि जरूरत पडऩे पर सप्लाई के प्रवाह को अपने हिसाब से सुनिश्चित कर सके। इस तरकीब से ऑक्सीजन सप्लाई को बाधित नहीं होने दिया। मरीजों के लिए ऑक्सीजन के बेहतर इस्तेमाल हेतु सप्लाई के साथ डिस्टिल वाटर या आर.ओ. वाटर का इंतजाम कर रखा था। गत वर्ष कोरोना संकट काल में बच्चे की सर्जरी होने के बावजूद कोरोना मरीजों का इलाज करके अपने पारिवारिक और सामाजिक दायित्वों को निभाया। इस वर्ष दूसरी लहर के समय भी बच्चे की दूसरी सर्जरी होने के बाद भी वे अपने कत्र्तव्य पर डटे रहे। परिवार को कोरोना संक्रमण से सुरक्षित रखने के लिए वह घर से होटल आ गए। मां और पत्नी ने भी उनका हौंसला बढ़ाया और कहा कि घर हम संभाल लेंगे, आप तो मरीजों की सेवा करें। वह 24 घंटे में ड्यूटी से केवल चार घंटे के लिए थोड़ी देर आराम करने एवं नहाने-धोने होटल जाते थे। वह अपने मरीजों का किसी परिवार की सदस्य की तरह ध्यान रखते थे। डॉ. शर्मा ने बताया कि एक दिन अचानक बिजली चले जाने से जब ऑक्सीजन कांसटे्रटर बंद हो गए, तो वह और उनके साथी डॉक्टर बेहद घबरा गए। मरीजों की जान की चिंता में वह रुंआसे हो गए थे और बिजली सप्लाई बहाल करने के लिए जी जान से भाग दौड़ कर बिजली की व्यवस्था कर स्थिति को बेकाबू नहीं होने दिया। डॉ. शर्मा रोजाना हर १५ मिनट में एक मरीज से बात कर उसका हाल जानते थे। जिन मरीजों को खतरा लगता वह उनसे बतियाते हुए उनका ध्यान भटकने नहीं देते। मरीजों के स्वास्थ्य में सुधार के लिए वह अन्य डॉक्टरों से लगातार उनके बारे में जानकारी लेते रहते। उन्होंने मरीजों के उपचार के साथ उनके लिए डाइट प्लान, सोने का तरीका, मनोबल बढ़ाने के लिए मरीजों से हंसी-मजाक का पारिवारिक माहौल बनाए रखा। किसी भी मरीज को बाजार से दवा नहीं खरीदने दी। मरीजों को इन्फेक्शन न हो, इसलिए वह स्वयं खड़े होकर अपने सामने साफ-सफाई कराते थे। इससे संक्रमित मरीजों की सुधार दर बढ़ती चली गई। संक्रमण काल में वे पल उनके लिए स्मरणीय एवं सुखद रहे जब मेडीकल कालेज शहडोल से डिस्चार्ज होकर तीन कोरोना के गंभीर मरीज उनके यहां आकर भर्ती हुए और पूर्ण स्वस्थ होकर घर चले गए। इस कार्य के दौरान शर्मा होम आइसोलेशन मरीजों की फोन से काउंसलिंग कर उनका उपचार भी करते रहे। ऐसे करीब 200 मरीज थे, जो डॉक्टर शर्मा की चिकित्सकीय सलाह एवं इलाज से 12 से 15 दिन के भीतर सब ठीक हो गए थे। खास बात यह कि मरीज डॉक्टर शर्मा के मधुर व्यवहार की वजह से उनसे खुलकर बात कर अपनी परेशानी साझा करते थे। वे आज भी मधुरता से अपने मरीजों से बात कर उनकी खैरियत के बारे में पूछताछ करते हैं। उनकी सेवा भावना, निष्ठा एवं मधुर व्यवहार की कार्यशैली ने उन्हें लोगों में लोकप्रिय बना दिया है। डॉ. शर्मा वर्तमान में अनूपपुर के खण्ड चिकित्सा अधिकारी हैं। हिन्दुस्थान समाचार/ राजेश शुक्ला