जैन धर्म के अनुसार रक्षा बँधन पर्व का है विशेष महत्व
जैन धर्म के अनुसार रक्षा बँधन पर्व का है विशेष महत्व
मध्य-प्रदेश

जैन धर्म के अनुसार रक्षा बँधन पर्व का है विशेष महत्व

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700 मुनियों की रक्षा का महा पर्व चंदेरी, 02 अगस्त (हि.स.)। चंदेरी नगर में वर्षायोग की अगाध साधना कर रहे संस्कार प्रणेता, मुनि श्री पद्मसागर महाराज ने जैन धर्म में रक्षा बंधन पर्व का विशेष महत्व बताते हुए इस पावन पर्व की कथा का वर्णन किया। भगवान मुनिसुव्रत के समय की कहानी है। कहतैं हैं उज्जैनी नगरी में राजा श्रीवर्मा राज्य करते थे। उनके बलि,नामुचि, बृहस्पतिऔर प्रह्लाद आदि चार मंत्री थे। उनको धर्म पे श्रद्धा नहीं थी। कथा का सम्पूर्ण बृतान्त बताते हुए प्रवीण जैन जैनवीर ने बताया कि श्री विष्णु कुमार जी महामुनि की पूजन, श्री अकम्पनाचार्य आदि 700 मुनियों की पूजनकी एवं बताया कि जैन धर्म में रक्षा बंधन का विशेष महत्व क्यों है। विष्णु कुमार मुनिराज ने अकंपनाचार्य संघ के 700 मुनिराज की रक्षा करके श्रमण संस्कृति की भी रक्षा की और सम्यग्दर्शन के वात्सल्य अंग में प्रसिद्ध हुए। एक बार उस नगरी में 700 मुनियों के संघ सहितआचार्य श्री अकम्पन जी का आगमन हुआ। राजा भी उनके मंत्री के साथ गए। राजा ने मुनि को वंदन किया, पर मुनि तो ध्यान में लीन मौन थे। राजा उनकी शांति को देखकर बहुत प्रभावित हुआ, पर मंत्री कहने लगे। " महाराज ! इन जैन मुनियों को कोई ज्ञान नहीं है इसीलिए मौन रहने का ढोंग कर रहे हैं। इसप्रकार निंदा करते हुए वापिस जा रहे थे और यह बात श्री श्रुतसागर जी नाम के मुनिश्री ने सुन ली , उन्हें मुनि संघ की निंदा सहन नहीं हुई,इसलिए उन्हों ने उन मंत्री के साथ वाद-विवाद किया। मुनिराज ने उन्हें चुप कर दिया। राजा के सामने अपमान जानकार वह मंत्री रात में मुनि को मारने गए पर जैसे ही उन्हों ने तलवार उठाई उनका हाथ खड़ा ही रह गया। सुबह सब लोगो ने देखा और राजा ने उन्हें राज्य से बाहर कर दिया । ये चार मंत्री हस्तिनापुर में गए यहाँ पद्मराय राजा राज्य करते थे,,, उनके भाई मुनि थे उनका नाम विष्णु कुमार था। सिंहरथ नाम का राजा, इस हस्तिनापुर के राजा का शत्रु था। पद्मराय राजा उसे जीत नहीं सकता था, अंत मे बलि मंत्री की युक्ति से उसे जीत लिया था, इसलिए राजा ने मुँह माँगा इनाम माँगने को कहा, पर मंत्री ने कहा जब आवश्यकता पड़ेगी तब माँग लूँगा। इधर आचार्य श्रीअकम्पन जीआदि 700 मुनि भी विहार करते हुए हस्तिनापुर पहुँचे, उनको देखकर मंत्री ने उन्हें मार ने की योजना बनायीं, उन्हों राजा के पास वचन माँग लिया। उन्हों ने कहा - "महाराज हमें यज्ञ करना है इसलिए आप हमें सात दिन के लिए राज्य सौप दें, राजा ने राज्य सौप दिया फिर मंत्रियो ने मुनिराज के चारो और पशु, हड्डी, मांस, चमड़ी के ढेर लगा दिए फिर आग लगा दी, मुनिवरो पर घोर उपसर्ग हुआ। यह बात विष्णुकुमार मुनि को पता चली, वह हस्तिनापुर गए और एक ब्राह्मण पंडित का रूप धारण कर लिया और बलि राजा के सामने उत्तमोत्तम श्लोक बोलने लगे। बलि राजा पंडित से बहुत खुश हुआ और इच्छित वर माँगने को कहा,,, विष्णुकुमार ने तीन पग जमीन माँगी। विष्णुकुमार ने विराट रूप धारण किया और एक पग सुमेरु पर्वत पर रखा और दूसरा मानुषोतर पर्वत पर रखा और बलि राजा से कहा - "बोल अब तीसरा पग कहा रखूँ ? तीसरा पग रखने की जगह दे नहीं तो तेरे सिर पर रखकर तुझे पाताल में उतार दूँगा। चारो और खलबली मचगयी। देवो और मनुष्यों ने विष्णुकुमार मुनि को विक्रिया समेटने के लिए कहा, चारो मंत्रियो ने भी क्षमा माँगी! श्री विष्णुकुमार मुनि ने अहिंसा पूर्वक धर्मं का स्वरूप समझाया, इस प्रकार विष्णुकुमार ने 700 मुनियों की रक्षा की, हजारो श्रावक ने 700 मुनियों की वैयावृति की और बलि आदि मंत्री ने मुनिराजो से क्षमा माँगी। जिस दिन यह घटना घटी, उसदिन श्रावण सुदी पूर्णिमा थी, विष्णुकुमार ने 700 मुनियों का उपसर्ग दूर हुआ और उनकी रक्षा हुई। अतः वह दिन रक्षा पर्व के नाम से प्रसिद्ध हुआ, आज भी यह दिन रक्षाबंधन पर्व के नाम से मनाया जाता है। वास्तव में कर्मो से न बंधकर स्वरूप की रक्षा करना ही 'रक्षा-बंधन ' है। हिन्दुस्थान समाचार/निर्मल विश्वकर्मा/राजू-hindusthansamachar.in