आलेख: मौत से हो रहे इस युद्ध में कहा प्लानिंग कमजोर है ? यह देखना होगा: शरद जोशी

आलेख: मौत से हो रहे इस युद्ध में कहा प्लानिंग कमजोर है ? यह देखना होगा: शरद जोशी
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आलेख: मौत से हो रहे इस युद्ध में कहा प्लानिंग कमजोर है ? यह देखना होगा कोविड के ताण्डव केे बीच जनता की लापरवाहियों को जमकर कोसा जा रहा है। ये लापरवाहियां अक्षम्य है। फिर भी जनता को मूलभूत आवश्यकताओं, स्वास्थ्य कारणों से भी सड़क पर उतरना पड़ता है। निरक्षर, डरे हुए भ्रमित तथा असुरक्षा की भावना लिए लोगों से भी नादानियां हो जाती है। लेकिन प्रशासन की बेचारगी का क्या? इसका तो अपना एक नेटवर्क है। जहां सबकी जवाबदारियां तय है, फिर प्रशासनिक संकुल से निकले आदेेश जमीन पर पहुंचते-पहुंचते 'हवा-हवाई' क्यों हो रहे हैं? यह कौन देखेगा की मौत से हो रहे इस युद्ध में कहां प्लानिंग कमजोर है? और कहां प्लानिंग असरकारी होने से पहलेे दम तोड़ रही है। जहां देश के मुखिया टेस्टिंग की संख्या बढ़ाने की अपील पर अपील कर रहे है वहीं कोविड टेस्टिंग की प्रक्रिया दुरूह कर दी गई है। विश्वसनीय आर्टिफिसियल टेस्टिंग की जगह रेपिड टेस्टिंग को तरहीज दी जा रही है। कई व्यक्तियों ने बताया कि उनका परीक्षण 107 घंटे पहलेे हुआ था, आज तक कोई भी अधिकारी, डाक्टर बताने को तैयार नहीं है कि वे कोरोना से ग्रस्त है या मुक्त? ऐसे अनिश्चय की स्थिति में जनता का घबराना अथवा गुमराह होना स्वाभाविक ही है। इससे जनता में ये धारणा बलवती हो रही है कि कुछ तो है, जो छिपाया जा रहा है? रिपोर्ट के अभाव में जिन्हें कोविड नहीं है वे भी हलकान हुए जा रहे हैं। प्रशासनिक तंत्र का समन्वय, सुदृढ़ता और जवाबदेही का नमूना तालाबंदी की शासकीय घोषणा के तत्काल बाद के उभरे हालातों में भी एक्सपोज हुआ। सड़क पर तुरतफुरत उभर आई भीड़ (जो अप्रत्याशित नहीं थी) गुत्थम-गुत्था होते वाहनों के बीच मानों सरकारी तंत्र तो गायब ही हो गया था। तालाबंदी का हल्के स्वर में कतिपय लोगों में विरोध भी उभरा है, लेेकिन सच ये भी है कि आपदा की इस विकट घड़ी को कुछ महानुभावों ने अपने लिए अवसर में बदल लेने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। - लेखक हिन्दुस्थान समाचार के वरिष्ठ संवाददाता हैं