केंद्रीय कृषि मंत्री द्वारा किसानों को लिखे गए पत्र पर दिग्विजय ने किया बिंदुवार पलटवार
केंद्रीय कृषि मंत्री द्वारा किसानों को लिखे गए पत्र पर दिग्विजय ने किया बिंदुवार पलटवार
मध्य-प्रदेश

केंद्रीय कृषि मंत्री द्वारा किसानों को लिखे गए पत्र पर दिग्विजय ने किया बिंदुवार पलटवार

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भोपाल, 23 दिसम्बर (हि.स.)। मप्र के पूर्व मुख्यमंत्री व राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह ने केंद्रीय कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर को उनके द्वारा किसानों को लिखे गए पत्र का बिंदुवार जवाब देकर एक पत्र लिखा है। अपने पत्र में दिग्विजय सिंह ने केंद्र सरकार के तीनों कृषि अध्यादेश को किसान विरोधी बतलाया हैं। दिग्विजय सिंह ने कृषि मंत्री से किसानों की मांगे मानने का अनुरोध करते हुए स्पष्ठ कहा है कि सरकार ये तीनों कानून वापस लें और नए कानून को संसद की प्रवर समिति में रखकर किसान संगठनों से चर्चा कर संसद में कानून पारित करें जिससे कॉर्पोरेट घरानों की जगह किसानों के हितों का संरक्षण हो सके। दिग्विजय सिंह ने अपने पत्र में कहा है कि मैंने देश के किसानों को संबोधित आपका आठ पेज का पत्र पढ़ा। कृषि मंत्री होने के नाते आपके द्वारा पत्र में व्यक्त भावनाओं को समझने का प्रयास किया। मैं पिछले 30 वर्षो से आपको जानता हूँ और आपकी निष्पक्षता और स्पष्टवादिता का प्रशंसक रहा हूँ। लेकिन लगता है कि इस पत्र का मज़मून आपके द्वारा तैयार नहीं किया गया है शायद किसी और की मंशा को आपके हस्ताक्षर से भेजने के लिए मजबूर किया गया है। आगे उन्होंने अपने पत्र में कहा आपने पत्र में स्वयं को किसान परिवार का बताया है, जबकि आपने माननीय केन्द्रीय चुनाव आयोग को लोकसभा चुनाव के समय 2014 में दिए गये शपथ पत्र में अपनी संपत्ति के ब्यौरे में यह स्वीकार किया है कि आपके पास कोई कृषि भूमि नहीं है। आपने व्यवसाय के कॉलम में किसान नहीं बल्कि समाजसेवी होने का हवाला दिया है। दिग्विजय सिंह ने केन्द्रीय कृषि मंत्री तोमर पर तंज कसते हुए कहा कि सही पूछिये तो आठ पेज के पत्र के अंत में आपने अन्न-दाताओं को कृषि सुधारों से संबंधित आश्वासन दिये है यदि संसद में चर्चा करके कृषि संबंधी तीनों कानूनों को संसद की प्रवर समिति को सौंप दिया होता तो इस आंदोलन की नौबत ही नहीं आती। कांग्रेस पार्टी सहित सभी विपक्षी दलों द्वारा विधेयकों पर चर्चा कराने की मांग को आपके द्वारा निरस्त कर दिया गया था। जबकि संसदीय परम्पराओं में यदि एक भी सदस्य मत विभाजन की मांग करता है तो लोकसभा अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, राज्यसभा सभापति, उपसभापति को मत विभाजन की मांग स्वीकार करने की ’’बाध्यता’’ है। आपने उन सभी संसदीय परम्पराओं को ठुकराते हुए मनमाने तरीके से बिल पास कराये और भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक काला अध्याय जोड़ दिया। दिग्विजय सिंह ने बिन्दुवार आपत्ति दर्ज की है। अपने पत्र के अंत में दिग्विजय ने आरोप लगाते हुए कहा कि किसानों की जायज़ मांगो को आपकी सरकार द्वारा बहुमत के अंहकार में अन्देखा नहीं करना चाहिये। आपकी सरकार की हठधर्मिता न सिर्फ किसान विरोधी है बल्कि समग्र रूप से राष्ट्रहित में भी नहीं है। बेेहतर यह होगा की आप इन कानूनों को तत्काल वापिस लेवें तथा संसद की प्रवर समिति को सौंप कर सभी किसान संगठनों से चर्चा कर ही संसद से पारित करें। जिससे कॉर्पोरेट घरानों की जगह किसानों के हितो का संरक्षण हो सके। हिन्दुस्थान समाचार/ नेहा पाण्डेय-hindusthansamachar.in