अस्थिरता के चंगुल से बाहर निकलें: जैनाचार्य
अस्थिरता के चंगुल से बाहर निकलें: जैनाचार्य
मध्य-प्रदेश

अस्थिरता के चंगुल से बाहर निकलें: जैनाचार्य

news

मन्दसौर, 02 अगस्त (हि.स.)। कोई भी महान लक्ष्य तब फलित होता है जब मनुष्य तन्मय बनकर उसके पीछे लग जाता है, पीछे लगे बिना लक्ष्य की प्राप्ति नहीं होती, ऐसा बनने में यदि कोई बाधा है तो वह है बुद्धि की अस्थिरता, बहुत बार अस्थिरता से मन-मस्तिष्क में नये-नये अनुपयोगी विचारों का ज्वार उमड़ता ही रहता है। फलतः वह कभी यह करना चाहता है तो कभी वह। एक भी काम उसका ढंग से पूरा नहीं हो पाता, वैचारिक अस्थिरता विकास का सबसे बड़ा व्यवधान है, यह किसी ओर से पैदा नहीं होता, यह व्यक्ति की स्वयं की अज्ञता व अज्ञानता से पैदा होता है। अस्थिरता में नये-नये कार्य प्रारंभ तो कर लिये जाते हैं मगर एक भी काम मुकाम तक नहीं पहुंच पाता, यह अस्थिरता पूरे जीवन को प्रभावित करती है। इस अस्थिरता से बचने के लिये लक्ष्य का निर्धारण आवश्यक है और उसकी प्राप्ति के लिये कटिबद्ध होने की जरूरत है। लक्ष्य बनाये बिना मंजिल की प्राप्ति नहीं होती। ये विचार शास्त्री कॉलोनी स्थित नवकार भवन में विराजित जैनाचार्य श्री विजयराजजी महाराज ने रविवार को अपने मंगल संदेश में कहे। उन्होंने कहा- बहु चिन्तता एक रोग आज प्रायः सभी को लगा हुआ है। बहुचिन्तता में व्यक्ति सोचता है- यह करूं और वह भी कर लूं, ऐसा करूं और वैसा भी कर लूं। वह एक साथ काम तो बहुत सारे छेड़ लेता है, किन्तु एक भी कार्य पूरा नहीं हो पाता, कार्य की अपूर्ण-अधूरी मानसिकता के कारण उसे हर काम की असफलता ही हाथ लगती है, समय व शक्ति का अपव्यय होता है, रिजल्ट शून्य रहता है। दिमागी अस्थिरता जीवन के लिये अभिशाप बन जाती है। कोई भी कितना भी निपुण व दक्ष क्यों न हो सब दिशाओं में एक साथ अपने चरण नहीं बढ़ा सकता, तीव्र मेघाशील पुरूष भी सब विषयों में एक साथ पारदर्शी विद्वान नहीं बन सकता। स्थिरता और नियमितता के साथ ही विकास के शिखर को प्राप्त किया जा सकता है। आचार्य श्री ने कहा-स्थित प्रज्ञ साधक ही साधना में प्रगतिशील होते है। अस्थिरता साधना में बहुत बड़ी बाधा है। यह स्वयं से निर्मित होती है तो स्वयं से ही समाधान मिलता है। ज्ञान की परिपक्वता आस्था को बढ़ाती है, आस्था ही स्थिरता लाती है। आस्था के बिना न अवस्था में परिवर्तन आता है न व्यवस्था में। आस्थाशील ही निष्ठावान होते है वे जिस कार्य को हाथ में लेते हैं उसे पूरा करके ही छोड़ते है। हिन्दुस्थान समाचार/अशोक झलौया/विजयेन्द्र/राजू-hindusthansamachar.in