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झारखंड

स्वरोजगार का बेहतरीन जरिया बना वर्मी कंपोष्ट

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गोड्डा, 23 फरवरी (हि.स.)। गोबर और घरेलू कचरे से तैयार किया जाने वाला वर्मी कम्पोष्ट किसानों के आय का बेहतरीन जरिया साबित हो रहा है। लॉकडाउन के बाद उपजे हालात में यह स्वरोजगार का साधन बन गया है। अदाणी पावर प्लांट के आस-पास के गांवों में रहने वाले दो सौ से अधिक किसान परिवार इस स्वरोजगार को अपनाकर अपनी जीविका चला रहै हैं। इसके लिए किसानों को प्रशिक्षण लेनी होती है। नयाबाद गांव की रहने वाली कनकलता सोरेन प्रतिमाह लगभग 10 कुंतल वर्मी कंपोष्ट तैयार करती है, जिससे उनको पांच-छह हजार रुपये प्रतिमाह की आमदनी होती है। इतना ही नहीं वे प्रतिमाह चार-पांच किलो केंचुआ बेचकर भी अतिरिक्त आमदनी करती हैं। कनकलता के स्वरोजगार की यात्रा अदाणी फाउंडेशन के तत्वावधान में मोतिया में लगाए गए ट्रेनिंग कैंप से शुरू हुई। यहां से प्रशिक्षण लेने के बाद गोड्डा के दो सौ से अधिक किसान केंचुआ खाद तैयार करके अच्छी खासी आमदनी कर रहे हैं। दरअसल एक गांव में पूर्ण रूप से जैविक खेती के लिए लगभग पांच हजार कुंतल केंचुआ खाद की जरूरत होती है। एक गांव में सारे किसान मिलकर भी केंचुआ खाद बनाने की कोशिश करें तब भी लगभग दो हजार कुंतल ही केंचुआ खाद तैयार हो पाएगा यानी मांग और पूर्ति के अंतर को देखा जाए तो साफ है कि इस क्षेत्र में अपार संभावना है। एक तरफ जहां जैविक खेती में उर्वरक के तौर पर मुख्य रूप से वर्मी कंपोष्ट का उपयोग किया जाता है तो वहीं, स्थानीय नर्सरी के अलावा दार्जिंलिंग के आर्गेनिक चाय बागानों में केंचुआ खाद की भरपूर मांग रहती है। क्या कहते हैं कृषि वैज्ञानिक वर्तमान दौर में खेती में प्रयुक्त रासायनिक खाद और कीटनाशक के अत्यधिक प्रयोग के चलते जैविक अनाज की मांग बहुत ज्यादा बढ़ी है। कृषि वैज्ञानिकों की माने तो वर्मी कंपोष्ट के इस्तेमाल से एक तरफ जहां मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार होता है तो वहीं, मिट्टी में नमी बनाए रखने की क्षमता भी काफी बढ़ जाती है। इसके अलावा मिट्टी में कार्बन कंटेंट एवं माइक्रो न्यूट्रेंट्स की मात्रा भी बढ़ जाती है। केंचुआ खाद से कितनी है कमाई ग्रामीणों को वर्मी कंपोष्ट तैयार करने का प्रशिक्षण देने के बाद अदाणी फाउंडेशन की ओर से किसानों को डिस्पोजेबल बैग एवं केंचुआ भी उपलब्ध कराया जाता है। बैग की लंबाई 12 फुट चौड़ाई 3 फुट और ऊंचाई 2.5 फुट होती है, जिसमें लगभग 1000 किलो वर्मी कंपोष्ट तैयार किया जा सकता है। साधारणतया 1200 से 1500 में एक ट्रैक्टर गोबर उपलब्ध है। मजदूरी और अन्य उत्पादन खर्च को जोड़ कर देखा जाय तो लगभग 2000 रुपये में एक बैग वर्मी कंपोष्ट तैयार हो जाता है, जिसे बेचकर 5 से 6 हजार की कमाई हो जाती है। अब अगर एक किसान के पास तीन बैग हैं तो वह प्रतिमाह 5 से 6 हजार रुपये की नियमित आमदनी कर सकता है। ऐसा ही मॉडल अदाणी पावर प्लांट के आस-पास के गांवों में रहने वाले 200 किसान परिवारों में चल रहा है। सोनडीहा, मोतिया, पटवा, बसंतपुर, रंगनिया, पेटवी, कौड़ीबहियार, गुम्मा, बेलवर्ना, डुमरिया समेत पथरगामा, महागामा एवं ठाकुरगंगटी के विभिन्न गांवों में आजीविका का श्रोत बना हुआ है। विशेष रूप से लॉकडाउन के दौरान प्रवासी मजदूर वापस घर पहुंचने के बाद अब इस तरह के स्वरोजगार के मॉडल को अपनाकर जीविकोपार्जन कर रहे हैं। हिन्दुस्थान समाचार / वंदना/चंद्र

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