झारखंड बजट में सिविल सोसाइटी को प्रमुखता मिलनी चाहिए : बलराम

झारखंड बजट में सिविल सोसाइटी को प्रमुखता मिलनी चाहिए : बलराम
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रांची, 18 फरवरी (हि.स.)। भूख एवं कुपोषण मुक्त झारखंड, आदिवासी एवं दलित तथा संपूर्ण सामाजिक सुरक्षा के लिए राज्य का बजट 2021-22 का बजट कैसा हो? इस विषय पर गुरुवार को काके रोड स्थित विश्वा प्रशिक्षण केंद्र में भोजन का अधिकार अभियान, झारखंड व झारखंड की सिविल सोसाइटी ने नागरिक संगठनों का दो दिवसीय सम्मेलन का आयोजन किया। सम्मेलन के पहले दिन भोजन के अधिकार अभियान के वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता एवं सुप्रीम कोटे के पूर्व राज्य सलाहकार बलराम ने कहा कि राज्य सरकार झारखंड में 2021-22 का बजट पेश करने वाली है। दलित और आदिवासी समुदाय के लिए बजट में मौलिक एवं समानता के अधिकार को ख्याल रखा जाना चाहिए। नागरिक संगठन यह चाहे जिम्मेदारी उठा सकती है और इसमें चुनौती के रूप में स्वीकार करना चाहिए। उन्होंने कहा कि सामाजिक सुरक्षा योजनाओ पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। बागवानी और कृषि कार्य की संस्कृति जो भारतीय और खास करके झारखंडी समुदाय के बीच आदि काल से रहा है। उसे फिर से पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है। सरकार स्पेशल इकनॉमिक ज़ोन बनती है लेकिन स्पेशल कृषि ज़ोन बनाने की अवश्यकता है। ये एक क्रांति लेकर आएगा। सरकार के पास काफी फ़ंड है। सरकार को चाहिए की ग्राम सभा से परामर्श के साथ इस राशि का इस्तेमाल हो जिससे जमीनी स्तर पर बदलाव दिखे। पेंशन इत्यादि मे केंद्र सरकार का अंशदान 200 रुपये काफी पुराने समय से चला आ रहा है, जिसे बढ़ाने की आवश्यकता है। सरकार के पास हर स्तर पर काफी इनफ्रास्ट्रक्चर है जिसे इस्तेमाल के लायक बनाना जरूरी है। प्रेम ने कहा कि कोविड के दौरान आए हुये संकट से जूझते हुये नागर समाज के बीच काफी मंथन हुआ जिससे बहुत सारे सुझाव निकल के आए हैं। पोषण को ध्यान मे रखते हुये मोटे अनाज जैसे मड़ुवा का उत्पादन तथा आँगनबाड़ी और मध्याहन भोजन मे इस्तेमाल पर ज़ोर देना चाहिए ताकि कुपोषण की समस्या दूर हो। कृषि योग्य भूमि का इस्तेमाल और हस्तांतरण गैर कृषि कार्य के लिए न हो। इसके लिए ठोस उपाय किए जाने की आवश्यकता है। प्रोफेसर ज्यां द्रेज़ ने कहा कि अज़ीम प्रेमजी संस्थान के शोध से सामने आया है कि लॉकडाउन के बाद मजदूरों के रोजगार और मेहनताना आधी हो चुकी है जो की अति गंभीर मसला है। कोविड की वजह से भूख और कुपोषण मे वृद्धि हुयी है। केंद्र सरकार का बजट जन विरोधी है। 2015-16 के केंद्र सरकार के बजट में पहले ही सामाजिक सुरक्षा के लिए राशि घटाया गया है। इस बार और अधिक काटा गया है। सात साल मे देखा जाये तो स्थिति भयावह होती जा रही है। मिड डे मील मे अंडों की संख्या घटाई गयी है। सरकार को सुझाव है कि आने वाले सालों मे सम्पूर्ण सामाजिक सुरक्षा लागू करने की दिशा मे आगे बढ़ना चाहिए। जेम्स हेरेंज ने झारखंड मे नरेगा की दशा पर विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत किया और कहा कि कम मजदूरी दर सबसे बड़ी समस्या है। इसलिए नरेगा की तरफ लोगों का रुझान कम है। उन्होंने कहा कि मनरेगा में कम मजदूरी एक बहुत बड़ी समस्या है। इसलिए इस बार के बजट में मजदूरी बढ़नी चाहिए और इसका बजट में प्रावधान होना। उन्होंने कहा मनरेगा योजनाओं के चयन में ग्राम सभा से चयन होना चाहिए। हिन्दुस्थान समाचार/कृष्ण-hindusthansamachar.in