विकास की राह तकता आदिम जनजाति असुर बहुल सनईटांगर व कोटेया गांव
विकास की राह तकता आदिम जनजाति असुर बहुल सनईटांगर व कोटेया गांव
झारखंड

विकास की राह तकता आदिम जनजाति असुर बहुल सनईटांगर व कोटेया गांव

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गुमला, 16 अक्टूबर ( हि.स.) । सरकार व प्रशासनिक महकमे की उदासीन रवैये से परेशान सनईटांगर गांव के आदिम जनजाति असुर समुदाय के युवकों ने खुद श्रमदान से दिरगांव – सनईटांगर पांच किमी लंबी सड़क बनाने का संकल्प लिया है। आदिम जनजाति असुर बहुल सनईटांगर गांव अति उग्रवाद प्रभावित क्षेत्र रहा है। यहां से प्रखंड मुख्यालय घाघरा जाने के लिए ग्रामीणों को 45 किमी की दूरी तय करनी पड़ती है। पांच सौ की आबादी वाले इस गांव के अजित असुर ने सड़क की जर्जर हालत पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि जब से यह धरती है,तब से दिरगांव से सनईटांगर जाने के लिए कोई रास्ता नहीं बना। उसने बताया कि सड़क निर्माण कार्य में प्रत्येक घर से कम से कम एक सदस्यों की सक्रिय उपस्थिति अनिवार्य है। निर्माण कार्य भी सप्ताह में सिर्फ एक दिन गुरूवार को किया जाता है। पिछले गुरूवार को श्रमदान से करीब तीन किमी सड़क को चलने लायक बना दिया गया है। अजित असुर ने अपने गांव की बदहाली के बारे में कई चौंकाने वाला खुलासा किया। सनईटांगर से पंचायत मुख्यालय दिरगांव की दूरी करीब पांच किमी है। यहां से दिरगांव बाईक से भी जाना काफी मुश्किल है। साईकिल को किसी तरह धकेल कर कर लोग पंचायत मुख्यालय जाते हैं। सनईटांगर से घाघरा की दूरी 45 किलोमीटर है। सनईटांगर से घाघरा निजी वाहन से जाने का एक रास्ता तो है लेकिन उसकी दूरी 90 किलोमीटर है। उसे गुरदरी, बनारी, बिशुनपुर होते हुए घाघरा पहुंचा जा सकता है। वो भी जोखिम भरा रास्ता है। गौरतलब है कि मात्र पांच किलोमीटर रास्ता नहीं होने के कारण ग्रामीणों को 45 के बजाय 90 किलोमीटर की दूरी तय कर घाघरा पहुंचना पड़ता है। सनईटांगर के पास ही कोटेया गांव है। इसकी भी यही कहानी है। इस गांव में सड़क के साथ साथ बिजली की भी समस्या है। सरकार 24 घंटे बिजली मुहैया कराने की बात करती है । मगर इन दोनों गांवों में अब तक बिजली नही पहुंच पायी है। इसी प्रकार स्वास्थ्य सेवा भी नगण्य है। एक तो गांव से गाड़ी से बाहर जाने का कोई रास्ता नही है और दूसरी ओर स्वास्थ्य उपकेंद्र पंचायत मुख्यालय दिरगॉव में है। अजित असुर ने बताया कि आज तक गांव की गर्भवती महिलाओं का प्रसव गांव में ही होता आ रहा है। किसी भी बच्चे का जन्म अस्पताल में नहीं हुआ है । दोनों गांवों में पेयजल मुहैया कराने के लिए हाल में ही पेयजल विभाग द्वारा एक टंकी बनाया गया है। जहां एक ही जगह से पूरा गांव अपने घरों तक पानी ले जाते हैं । यहां प्रमुख बात यह है कि सनईटांगर एवं कोटेया दोनों गांवों में असुर आदिम जनजाति के लोग निवास करते हैं । हिन्दुस्थान समाचार / हरिओम/वंदना/विनय-hindusthansamachar.in