हिन्‍दी से पूर्वोत्तर की भाषा, बोलियह और साहित्य होगा समृद्धि, राष्ट्रीय एकता बढ़ेगी : कुलपति कुलदीप चंद अग्निहोत्री
हिन्‍दी से पूर्वोत्तर की भाषा, बोलियह और साहित्य होगा समृद्धि, राष्ट्रीय एकता बढ़ेगी : कुलपति कुलदीप चंद अग्निहोत्री
हिमाचल-प्रदेश

हिन्‍दी से पूर्वोत्तर की भाषा, बोलियह और साहित्य होगा समृद्धि, राष्ट्रीय एकता बढ़ेगी : कुलपति कुलदीप चंद अग्निहोत्री

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धर्मशाला, 02 अगस्त (हि.स.)। हिमाचल प्रदेश केन्द्रीय विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय वेबिनार “पूर्वोत्तर का हिंदी साहित्य: स्थिति और संभावनाएं” को संबोधित करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. कुलदीप चंद अग्निहोत्री ने कहा कि हिंदी साहित्य के साथ पूर्वोत्तर के साहित्य को भी यदि पढ़ाया जाता है तो इससे पूर्वोत्तर की लोक भाषाएँ हिंदी भाषा को किसी न किसी रूप में और मजबूत करेंगी। उन्होंने कहा कि वर्तमान भाषा का विवाद ग्रियर्सन ने शुरू किया था। उत्तर-पूर्व भारत अपनी भाषा को लेकर गौरवान्वित महसूस नहीं करता है और वहां का समाज अपनी भाषा और संस्कृति को लेकर जागृत नहीं है। कोई भी समाज अपनी भाषा को छोड़कर किसी दूसरी भाषा को पकड़ लेता है तो वह अपने समाज को गूंगा कर देता है। उत्तर-पूर्व भारत गूंगा हो रहा है। ऐसी स्थिति में उत्तर-पूर्व की भाषा को जिन्दा करने और नई चेतना जगाने का काम हिंदी कर सकती है। हिंदी और उत्तर-पूर्व की भाषा में बहुत कुछ समानता है। अंग्रेजी के औपनिवेशिक फैलाव ने उत्तर-पूर्व की भाषाओँ को बहुत नुकसान पहुंचाया है। देवनागरी लिपि से पूर्वोत्तर की भाषा, बोली और साहित्य की समृद्धि से राष्ट्रीय एकता बढ़ेगी। वेबिनार में विशिष्ट अतिथि, विश्व हिंदी सचिवालय, मारीशस, के महासचिव प्रो. विनोद कुमार मिश्र ने “पूर्वोत्तर की हिंदी पत्रकारिता” विशेष कर असम केन्द्रित हिंदी पत्रकारिता पर बोलते हुए कहा कि हिंदी सदैव राष्ट्रीय एकता की भाषा रही है। पत्रकारिता, समाज में घटित होने वाली घटनाओं के विषय में जानकारी देती है। वास्तव में, पत्रकारिता जनभावना की अनुभूति है। वहीं वेबिनार के प्रथम दिन के मुख्य अतिथि केन्द्रीय हिंदी संस्थान, आगरा के निदेशक प्रो. नन्द किशोर पाण्डेय ने अरुणाचल की लोक-संस्कृति की ओर ध्यानाकर्षित करते हुए वहां की जनजातियों, नदियों, स्थानीय देवी-देवताओं से जुड़ी कहानियों, लोकगीतों, लोक-कथाओं में विशेष कर सृष्टि उत्पत्ति की कथा, नृत्य आदि का परिचयात्मक और सारगर्भित उदाहरण प्रस्तुत किया। अरुणाचल की जनजातियों की कथाएँ शेष भारत की कथाओं को जोड़ती है। कार्यक्रम का संचालन करते हुए हिंदी के अध्यक्ष डॉ. राजकुमार उपाध्याय मणि ने पूर्वोत्तर भारत के आठ राज्यों की भाषा, संस्कृति और सामाजिक स्थिति का परिचय कराया और कहा कि हिमाचल से अरुणाचल की एक संस्कृति और एक जनमानस है। ईटानगर से प्रो. डॉ ओकेन लेगो ने अरुणाचल की लोक संस्कृति के धार्मिक पक्ष, लोक पर्व-त्यौहार, वेशभूषा, न्याय-व्यवस्था, सामाजिक स्थिति, सांस्कृतिक वर्जनाओं तथा सांस्कृतिक निषिध्दियां आदि पर विस्तृत प्रकाश डाला। वेबिनार के दूसरे दिन मुख्य वक्ता के रूप में जुड़े यू.जी.सी. के सदस्य प्रो. किरण हजारिका ने “रामकाव्य की परम्परा और पूर्वोत्तर भारत में रामकाव्य की धारा” पर अपना वक्तव्य देते हुए कहा कि रामायण हमारे देश की सभ्यता और संस्कृति का सच्चा जीवन दर्शन है। उन्होंने पूर्वोतर भारत और भारत के अन्य हिस्से में लिखी गयी प्राचीन और आधुनिक रामायण के द्वारा रामकाव्य की परम्परा का विस्तृत और विराट स्वरूप की चर्चा की। हिन्दुस्थान समाचार/सुनील-hindusthansamachar.in