कारगिल दिवस : कारगिल युद्ध के पहले शहीद बने थे पालमपुर के कैप्टन सौरभ कालिया
कारगिल दिवस : कारगिल युद्ध के पहले शहीद बने थे पालमपुर के कैप्टन सौरभ कालिया
हिमाचल-प्रदेश

कारगिल दिवस : कारगिल युद्ध के पहले शहीद बने थे पालमपुर के कैप्टन सौरभ कालिया

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धर्मशाला, 25 जुलाई (हि.स.)। कारगिल युद्ध के 26 जुलाई को 21 साल पूरे हो रहे हैं। इस बार 21वां कारगिल विजय दिवस आ रहा है, ऐसे में हिमाचल के कांगड़ा जिला के एक ऐसे लाल की कुर्बानी बार-बार याद आती है, जिन्होंने इस युद्ध में पहली शहादत पाई थी। जी हां बात हो रही है कांगड़ा जिला के पालमपुर से संबंध रखने वाले कैप्टन सौरभ कालिया की। छोटी उम्र में ही देश के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले कैप्टन सौरभ कालिया जिस वक्त शहीद हुए थे उस समय तो उन्हें भारतीय सेना में बतौर कैप्टन तैनाती मिले एक महीना भी पूरा नही हुआ था। यही नही अपना कैप्टन कालिया शहादत से पूर्व अपना पहला वेतन तक नहीं ले पाए थे। भारतीय सेना की चार जाट रेजिमेंट के कैप्टन सौरभ कालिया ने ही सबसे पहले कारगिल में पाक के नापाक इरादों की जानकारी भारतीय सेना को दी थी। 5 मई, 1999 की रात पांच साथियों के साथ कैप्टन कालिया को बजरंग पोस्ट में पेट्रोलिंग करते हुए पाकिस्तानी घुसपैठियों की सूचना मिली थी। कैप्टन कालिया ने जैसे ही अपने साथियों के साथ वहां से कूच किया तो घात लगाकर बैठे पाकिस्तानी घुसपैठियों ने पांचों को घायल अवस्था में पकड़ लिया। उसके बाद उन्हें बंधक बनाकर 22 दिन तक दिल को दहला देने वाली यातनाएं दी थीं और तीन हफ्ते बाद उनकी पार्थिव देह क्षत-विक्षत हालत में भारतीय सेना के हवाले कर दी। कैप्टन कालिया के साथियों में बनवारी लाल, मूला राम, नरेश सिंह, भीखा राम और अर्जुन राम शामिल थे। परिजनों को वीर जवान की पार्थिव देह 9 जून, 1999 को क्षत-विक्षत हालत में सौंपी गई थी। उस वक्त से लेकर उनके पिता अपने स्तर पर न्याय की लड़ाई लड़ रहे हैं। कारगिल युद्ध के 21 वर्ष बीतने के बाद भी परिजनों को लाडले पर किए अत्याचारों के खिलाफ न्याय नहीं मिल पाया है। शहीद कैप्टन कालिया के पिता डॉ. एनके कालिया और माता विजय कालिया को इस बात का दुख है कि केंद्र सरकार ने मामले को अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तक नहीं पहुंचाया। बार-बार कई मंचों पर अपने शहीद बेटे के लिए न्याय की गुहार लगाई लेकिन उन्हें आज तक न्याय नही मिल पाया जिसका उन्हें काफी मलाल है। इसके साथ ही पालमपुर के ही कैप्टन विक्रम बतरा ने भी इस युद्ध में शहादत पाई थी। इन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया था। हिन्दुस्थान समाचार/सतेंद्र/सुनील-hindusthansamachar.in