नई शिक्षा नीति का कहीं स्वागत तो कहीं विरोध
नई शिक्षा नीति का कहीं स्वागत तो कहीं विरोध
दिल्ली

नई शिक्षा नीति का कहीं स्वागत तो कहीं विरोध

news

नई दिल्ली, 30 जुलाई (हि.स.)। दुनिया के सभी देश अपनी नातियों में समय के अनुसार बदलाव करते रहते हैं। इन बदलावों की कुछ लोग सराहना करते हैं तो कुछ लोग आलोचना करते हैं। नई शिक्षा नीति के साथ भी यही हो रहा है। नई शिक्षा नीति को लेकर हिन्दुस्थान समाचार ने विभिन्न संस्थानों के शिक्षाविदों, शोधार्थियों से इस पर उनकी प्रतिक्रिया जानी। जीबी एकेडमी के संस्थापक डॉ. के.कुमार ने कहा कि शिक्षा नीति में 34 साल बाद जो बदलाव किया गया है, काबिले तारीफ है। यह नीति भारत की नई तकदीर की कहानी लिखेगी। इसके लागू होने से सभी को सामान शिक्षा का अधिकार प्राप्त होगा। नीति एक समान शिक्षा स्तर, निष्पक्षता, गुणवत्ता, समावेशी और जवाबदेही के स्तंभों पर आधारित है और अत्यंत सराहनीय है। नई शिक्षा नीति नए भारत के निर्माण में मील का पत्थर साबित होगी। पीएडी स्कॉलर पंकज शर्मा का कहना है कि मुझे नई शिक्षा नीति वर्तमान समय के अनुसार प्रासंगिक लगती है। समय और बाजार की मांग के अनुसार व्यावहारिक शिक्षा प्रणाली की भारत को आवश्यकता है। परंपरागत शिक्षा पद्धति में विकल्पों का अभाव नज़र आता था। आज कौशल विकास के साथ शिक्षा को बढ़ावा देने की आवश्यकता है जिसमें युवा शिक्षित बेरोजगार बनकर न रहे। सरकार ने सही समय पर सटीक कदम उठाया है। इंडियन नेशनल टीचर कांग्रेस के संयोजक डॉ.पंकज गर्ग का मानना है कि नई शिक्षा नीति निजी शिक्षण केंद्रों को शिक्षण-अधिगम की आउटसोर्सिंग को प्रोत्साहित करेगी। विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में अपने मानदंडों पर काम करने की अनुमति देकर शिक्षा क्षेत्र में एफडीआई की अनुमति दी जा रही है। नई शिक्षा नीति का इंटेक हम निंदा करते हैं। केन्द्र सरकार ऋण आधारित शिक्षा की ओर बढ़ रही है और विश्वविद्यालय को अपने स्वयं के संसाधनों को उत्पन्न करने के लिए मजबूर कर रही है जो केवल छात्रों की फीस में वृद्धि करके किया जा सकता है। शिक्षाविद प्रो. हंसराज सुमन का कहना है कि कोरोना काल में सरकार ने जिस तरह से नई शिक्षा नीति को लागू किया है उससे स्पष्ट है कि फिलहाल किसी तरह का विरोध नहीं होगा और सरकार अपने मन की भी कर लेगी। नई शिक्षा नीति में समाज विज्ञान और भाषा संबंधी विषयों में लोगों की रुचि कम होगी। अब उच्च शिक्षा में डिग्री का महत्व कम हो जाएगा क्योंकि निजी क्षेत्र में शिक्षा के जाने से उसकी गुणवत्ता पर ध्यान नहीं जाएगा। स्थायी नौकरी का प्रावधान करीब-करीब खत्म कर दिया गया है। अब उसके स्थान पर सीमित समय के लिए नियुक्तियां की जाएंगी, एक ही पद पर अलग-अलग वेतनमान पर शिक्षक रखे जाएंगे। आरक्षण का प्रावधान शिक्षा में खत्म कर दिए गए हैं अर्थात न प्रवेश में आरक्षण की स्थिति बनाई जाएगी न ही नियुक्तियों में।इसका सबसे बड़ा दुष्प्रभाव देश की बहुजन आबादी पर पड़ेगा। हिंदुस्थान समाचार / राजेश-hindusthansamachar.in