आक्रोश दिलाती है राजनीति और नौकरशाही की न्यूनताएं : प्रो. राकेश सिन्हा

आक्रोश दिलाती है राजनीति और नौकरशाही की न्यूनताएं : प्रो. राकेश सिन्हा
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बेगूसराय, 04 मई (हि.स.)। राज्यसभा सदस्य प्रो. राकेश सिन्हा ने कहा है कि राजनीति में दोष था, है और तब तक रहेगा, जबतक निकम्मे भ्रष्ट राजनेता का गांव शहर पहुंचते ही लोग लट्टू होते रहेंगे। ऐसे लोगों के बारे में सब कुछ जानकर भी शादी-ब्याह और कार्यक्रमों में हमारे लिए वे आकर्षण के केंद्र हो जाते हैं। ऐसी राजनीतिक रुझान अच्छा नहीं है। पश्चिम के समकालीन लोकतंत्र में यह नहीं है। उन्होंने मंगलवार को कहा कि पहले हम कहते थे यथा राजा तथा प्रजा, अब कहना होगा यथा प्रजा तथा राजा लेकिन, न्यूनताओं को एक दिन में कुछ लोगों द्वारा समाप्त नहीं किया जा सकता है। लोकतंत्र जब जमीन पर मजबूत होगा तब राजनीति अपने औकाद में रहेगा। अंकुश लगाने न्यूनताओं से लड़ने के लिए स्वयं को जाति, बिरादरी, भाई, भतीजावाद से मुक्त करना होगा। उसकी तैयारी तो नाम मात्र की है। जो कहता है ऐसा बोलता, लिखता और करता है, उसे अव्यवहारिक कहकर बेचारा बना दिया जाता है। प्रोफ़ेसर सिन्हा ने कहा कि राजनीति तो बदलना चाहती है, समाज उसे बदलने नहीं देता है। 24 घंटे दिन-रात लगने के बावजूद लोग जाने अनजाने भला बुरा लिखते हैं तो कुछ हद तक स्वाभाविक है। राजनीति और नौकरशाही की न्यूनताएं उन्हें आक्रोश दिलाती है। लेकिन वह भी रचनात्मक स्वरूप में हो तो परिणाम अच्छा होगा। यह नहीं विस्मरण होना चाहिए कि भारतीय समाज अपनी आंतरिक शक्ति से अनेक बाधाओं को पार करने की क्षमता रखती है। इसलिए अभी का काल न्यूनता ढूंढ़ने, परस्पर उलझने का वक्त नहीं है एकजुटता के प्रदर्शन का समय है। जो जिस स्तर पर है वह एक दूसरे को जोड़कर समाधान का माला बना सकता है। उपदेश और उलाहना, श्रय या अपयश गिनाना अनुचित लगता है। बल्कि किए गए कार्यों को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत कर निष्क्रिय को भी सक्रिय कर सकते हैं। किसी ने मुझसे पूछा लेख लिखने का वक्त है, क्या जवाब दूं ? रात को तीन घंटे सोकर समय बचाकर बौद्धिक कार्य तो किया ही जा सकता है। रचनात्मक ऊर्जा, सकारात्मक सोच और निडर, लेेकिन उदार मन से पैदा होता है और ऐसा होने से ही व्यक्तित्व का अधिकतम उपयोग होता है। हिन्दुस्थान समाचार/सुरेन्द्र/चंदा