साम्राज्यवाद से संघर्ष करने वाले बाल शहीदों के सम्मान में बने संग्रहालय : राकेश सिन्हा

साम्राज्यवाद से संघर्ष करने वाले बाल शहीदों के सम्मान में बने संग्रहालय : राकेश सिन्हा
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बेगूसराय, 24 मार्च (हि.स.)। राज्यसभा सदस्य प्रो. राकेश सिन्हा ने राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम में साम्राज्यवाद से संघर्ष करने वाले बाल शहीदों के सम्मान में संग्रहालय बनाने का मामला सदन में बुधवार को उठाया। उन्होंने कहा है कि देश स्वतंत्रता का 75 वां सालगिरह मनाने जा रहा है। भारतीय साम्राज्य विरोधी आंदोलन का वैशिष्ट्य सांस्कृतिक राष्ट्रवाद था। इसके कारण राष्ट्रवाद के भाव का संचार समाज के सभी तबकों और आयु वर्ग के बीच सहजता के साथ हुआ। राकेश सिन्हा ने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन की बुनियाद भारत माता के गौरव को पुनर्स्थापित करना था। इसी सांस्कृतिक चेतना ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को दुनिया के दूसरे साम्राज्यवादी आंदोलनों से अलग और विशिष्ट रूप प्रदान करता है। इसी खासियत का हिस्सा अल्प आयु के बच्चों का साम्राज्य विरोधी संघर्ष में अग्रणी भूमिका थी। उनमें परिपक्वता और राष्ट्रीयता की समझ असाधारण थी। पटना सचिवालय पर तिरंगा फहराने के संकल्प में 11 अगस्त 1942 को जिन सात सेनानियों ने शहादत दी, उनमें से चार उमाकांत सिंह, रामानंद सिन्हा रामगोविंद और देवीपद नौवीं कक्षा के छात्र थे तथा राजेंद्र और सतीश दसवीं कक्षा के छात्र थे। उड़ीसा के बाजी राउत ने मात्र 12 वर्ष की आयु में शहादत दी थी। इसी आयु में असम के तिलेश्वरी बरूआ ने शहादत प्राप्त किया। महाराष्ट्र के शिशिर कुमार मेहता की आयु मात्र 15 वर्ष थी, जब वे शहीद हुए। असम की कनकलता बरूआ ने 17 वर्ष और खुदीराम बोस ने 18 वर्ष की आयु में राष्ट्र के लिए प्राणोत्सर्ग किया। उन्होंने कहा कि ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं और वे सभी हमारी प्रेरणा और राष्ट्रवादी उर्जा के स्रोत हैं। सरकार स्वतंत्रता के 75वें सालगिरह के अवसर पर बाल स्वतंत्रा सेनानियों के संबंध में ओरल हिस्ट्री के तहत जानकारियां एकत्रित कर, उनके लिए एक राष्ट्रीय संग्रहालय बनाए। प्रकाशन विभाग, राष्ट्रीय अभिलेखागार और नेशनल बुक ट्रस्ट परस्पर समन्वय बनाकर इन बाल शहीदों पर मोनोग्राफ का प्रकाशन करे, उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। हिन्दुस्थान समाचार/सुरेन्द्र/चंदा

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