बारिश एवं तापमान को लेकर धान में होने वाले रोगो को करें नियंत्रित : डॉ. सुनीता कुशवाहा
बारिश एवं तापमान को लेकर धान में होने वाले रोगो को करें नियंत्रित : डॉ. सुनीता कुशवाहा
बिहार

बारिश एवं तापमान को लेकर धान में होने वाले रोगो को करें नियंत्रित : डॉ. सुनीता कुशवाहा

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बेगूसराय, 23 जुलाई (हि.स.)। मौसम में हो रहे बदलाव तथा तापमान में हो रहे उतार-चढ़ाव के कारण धान के फसल में व्यापक पैमाने पर रोग लग सकता है। इसके मद्देनजर कृषि विज्ञान केंद्र द्वारा गाइडलाइन जारी किया गया, जिसका अनुपालन कर किसान अपने फसल की रक्षा कर सकते हैं। बेगूसराय के कृषि विज्ञान केन्द्र खोदाबंदपुर के प्रधान सह वरीय वैज्ञानिक डॉ. सुनीता कुशवाहा ने बताया कि खरीफ की प्रमुख फसल धान बढ़वार की अवस्था में है। इस समय मौसम में हो रहे बदलाव, बारिश एवं तापमान में उतार चढ़ाव के कारण धान में रोग लग सकते है। किसानों को इससे बचने के लिए उपाय करना आवश्यक है।बैक्टीरियल लीफ ब्लाईट (झुलसा) के कारण नहरी/सिंचित खेत की अवस्था में धान की पत्ती नोंक की तरफ से अन्दर की तरफ पीली पड लहरदार होकर सूखने लगती है तथा पुआल जैसे दिखने लगती है। इससे बचाव के लिये 15 ग्राम स्ट्रेप्टोसाइक्लिन तथा पांच सौ ग्राम कापर आक्सीक्लोराइड पानी में मिलाकर प्रति हेक्टयर में छिडकाव करें। शीश ब्लाइट में पत्तियों और तनों पर अनियंत्रित आकार के धब्बे बनते हैं, जिनका किनारा गहरा भूरा तथा बीच का भाग हल्के रंग का होता है। इसमें पूरा शीश प्रभावित भी हो जाता है तथा सड़ने लगता है। इससे बचाने के लिए कार्बेन्डाजिम पांच सौ ग्राम प्रति हेक्टेयर या हेक्साकोनाजोल एक लीटर प्रति हेक्टेयर या प्रोपीकोनाजोल पांच सौ एमएल प्रति हेक्टेयर की दर से पानी में घोलकर स्प्रे करें। झोका (ब्लास्ट) रोग धान का अत्यन्त ही विनाशकारी रोग है, जिससे पत्तियों एवं उनके निचले भागो पर आंख के आकार के छोटे धब्बे बनते है जो बाद में बढ़कर नाव की तरह हो जाते हैं। यह फंफूदजनित रोग पौधों की पत्तियों, गांठों एवं बालियों के आधार को भी प्रभावित करता है। इसमें धब्बों के बीच का भाग राख के रंग का तथा किनारे कत्थई रंग के घेरे की तरह होते हैं। समय पर नियंत्रण नहीं होने पर शत-प्रतिशत फसल की हानि होती है। इससे फसल को बचाने के लिए कार्बेन्डाजिम की पांच सौ ग्राम मात्रा प्रति हेक्टयर की दर से एक-दो छिड़काव दस दिन के अन्तराल पर करें। उन्होंने बताया है कि रोगों से बचाव के लिए खेत में अत्याधिक जल-जमाव नहीं होने दें। नाइट्रोजन उर्वरकों (यूरिया आदि) का संतुलित मात्रा में प्रयोग करें। मेड़ की साफ-सफाई रखें, जिससे गंधी आदि कीटों का नियंत्रण किया जा सके। तना छेदक (स्टेम बोरर) कहे जाने वाली इस कीट की रोकथाम के लिए आठ से दस कि.ग्रा. फिपरोनिल रोपाई के 25 से 30 दिन के अंदर प्रयोग करें। इसके अलावा धान में पोषक तत्वों की कमी से होने वाले खैरा रोग से बचाव के लिए जिंक सल्फेट का छिड़काव करें। हिन्दुस्थान समाचार/सुरेन्द्र-hindusthansamachar.in