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बिहार

रोहतास के कृषि विज्ञान केंद्र ने पुआल को किसानों की आय से जोड़ा

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खेतों की उर्वरता बचाने के लिए नया प्रयोग शुरू आरा,22 मई(हि. स.)।बिहार सरकार खेतों में पुआल या कृषि अवशेष जलाने पर किसानों के खिलाफ कार्रवाई के लिए उठाये गए कदम के बीच इसे जलाने की बजाय इससे आमदनी बढ़ाने के उपाय करने की दिशा में प्रयास करने की बात गंभीरता से सोच रही है।खेतों में फसलों की कटाई के बाद इसके अवशेष को खेत में ही जला देने की किसानों की कार्यशैली सरकार के लिए चिंता का विषय बनी हुई है। खेतों में पुआल जलाने से खेत की मिट्टी की उर्वरा शक्ति खत्म हो जाती है और पर्यावरणीय खतरा पैदा हो जाता है। ऐसी स्थिति में रोहतास के कृषि विज्ञान केंद्र से सुखद और राहत भरी खबर सामने आई है। रोहतास के कृषि विज्ञान केंद्र ने खेतों में फसल कटाई के बाद बची पुआल और अवशेष को किसानों की आय से जोड़ दिया है। रोहतास कृषि विज्ञान केंद्र का यह प्रबन्धन अब देश भर के किसानों के लिए अच्छी आय के स्रोत का उदाहरण बन कर सामने आया है। रोहतास जिले के बिक्रमगंज स्थित केवीके रोहतास ने हर साल खेतों में जला दिए जाने वाले फसल अवशेष और पुआल को पहले किसानों के लिए आमदनी का माध्यम बनाया। यह साबित करके दिखाया कि किसान जिस पुआल को अनुपयोगी अवशेष समझकर जला दे रहे हैं, उससे भी अच्छी कमाई हो सकती है और इसे लाभ का जरिया बनाया जा सकता है। रोहतास के कृषि विज्ञान केंद्र ने बेलट से पुआल का बंडल बनाकर शाहाबाद डेयरी को बेचा तो लागत से लगभग दोगुना लाभ हुआ। कृषि विज्ञान केंद्र ने इसके बाद इसे उद्यम बनाने का निर्णय लिया है। रोहतास के इस मॉडल को अब इको एग्रीकल्चर अवार्ड-2021 से सम्मानित किया गया है। इको एग्रीकल्चर अवार्ड 2021 का यह कार्यक्रम वर्चुअल माध्यम से ऑनलाइन आयोजित किया गया। कृषि विज्ञान केंद्र रोहतास के वरीय वैज्ञानिक रविन्द्र कुमार जलज ने पुरस्कार प्राप्त किया। इस वर्चुअल कार्यक्रम में बिहार सरकार के कृषि सचिव डॉ एन सरवन उपस्थित थे। उन्होंने जल जीवन हरियाली अंतर्गत जलवायु अनुकूल कृषि कार्यक्रम के अंतर्गत केवीके रोहतास द्वारा पुआल को बंडल बनाकर बेचने के लिए शाहाबाद दुग्ध उत्पादक सहकारी समिति आरा से समझौता किये जाने पर खुशी का इजहार किया। उन्होंने पूरे मॉडल के बारे में विस्तार से बताया और इसे दूसरे जिलों में भी लागू करने का निर्देश दिया। ज्ञात हो कि विभाग इन दिनों किसानों को पुुुआल उद्योग के लिए प्रेरित कर रहा है। इस योजना के लिए बहुत काम करने की जरूरत भी नहीं है।किसान को सिर्फ बेलट से बंडल बनाना होगा। बेलट की खरीदारी पर 75 प्रतिशत का अनुदान भी सरकार देती है। कृषि विज्ञान केंद्र द्वारा निर्मित पुआल से बने बंडल दुग्ध उत्पादन समितियां खरीद रही हैं। किसान और कृषि विज्ञान केंद्र की इस पहल को अब कृषि विभाग रोजगार से जोड़ने की दिशा में जुट गया है।बेलट के माध्यम से खेतों में पड़ी पुआल अब किसानों को अच्छी कीमत देगी और किसानों की आय भी बढ़ेगी। बेलट खेतों में पड़े धान के बचे अवशेष या पुुुआल का गट्ठर तैयार करती है।इसका वजन 25 किलो से लेकर 40 किलो तक होता है। कृषि विज्ञान केंद्र के अधिकारियों के अनुसार कृषि विभाग के निर्देश को प्राथमिकता देते हुए एक बीघा में 12 क्विंटल पुआल से प्रबन्धन के लिए कृषि विज्ञान केंद्र रोहतास ने 50 एकड़ क्षेत्रफल में पराली प्रबंधन के तहत टाउंड स्ट्रालट मशीन से पुआल का गट्ठर बनाने का कार्य शुरू किया है। बिहार कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति आरके सोहाने बताते हैं कि एक बीघा में धान लगे खेत से लगभग नौ से 12 क्विंटल पुआल निकलती है। विदित हो कि केवीके रोहतास ने जलवायु अनुकूल कृषि कार्यक्रम के तहत दो ग्राम सुरहुरिया एवं जमोडी में पहली बार राउंड बेलर मशीन का प्रयोग कराया था। इस मशीन की मदद से 25 एकड़ क्षेत्रफल की पुआल को उठाकर बंडल बनाकर शाहाबाद दुग्ध उत्पादक सहकारी समिति को बेचा था।इस पूरे क्षेत्र में बिना पुुुआल जलाए किसानों ने खेतों में गेहूं बोए थे। केवीके रोहतास के प्रधान आरके जलज ने बताया कि एक एकड़ क्षेत्रफल में लगभग 1800 रुपये राउंड बेलर मशीन चलाने का खर्च आता है और 13 से 16 क्विंटल पुआल इकट्ठा होती है। दो रुपये प्रति किलोग्राम बेचने पर किसानों को 2600 से 3200 रुपये का लाभ मिल सकता है। खेतों में इकट्ठा पुुुआल के बंडलों को पशु चारे के रूप में कुट्टी काटकर इस्तेमाल किया जाता है। बरसात के महीने तक अगर इसे सुरक्षित रखा जाए तो पांच से छह हजार प्रति क्विंटल पशु चारा कुट्टी बिक सकती है। इससे पुआल जलाने सेेे होने वाले प्रदूषण से निजात मिल जाएगी और किसानों को अतिरिक्त आर्थिक लाभ भी होगा। हिन्दुस्थान समाचार/सुरेन्द्र/विभाकर