शैक्षिक संरचना में बदलाव एक बड़ी चुनौती
शैक्षिक संरचना में बदलाव एक बड़ी चुनौती
बिहार

शैक्षिक संरचना में बदलाव एक बड़ी चुनौती

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गया, 18 अक्टूबर (हि.स.) दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय (सीयूएसबी) के शिक्षक-शिक्षा विभाग, शिक्षा पीठ द्वारा राष्ट्रीय शिक्षा नीति , 2020 के आयामों पर चर्चा के उद्देश्य से आयोजित 15 दिवसीय व्यख्यान श्रृंखला के अंतर्गत देश के वर्तमान एवं पूर्व के शैक्षिक संरचना पर रविवार को विचार विमर्श किया गया। जन संपर्क पदाधिकारी मो. मुदस्सीर आलम ने बताया कि शिक्षा विभाग के प्राध्यापकों ने शिक्षा नीति से जुड़े नई संरचना का विश्लेषण किया। वेबिनार की शुरुआत में सहायक प्राध्यापिका डा. चंद्रप्रभा पाण्डेय ने ‘ऐतिहासिक विश्लेषण: एनईपी 2020’ के संदर्भ में अपने विचार रखे । डॉ. पाण्डेय ने अपनी बात राष्ट्रीय शिक्षा नीति के ऐतिहासिक परिपेक्ष्य से शुरू की और बताया कि तमाम योजनाओं और तैयारियों के बावजूद शैक्षिक संरचना में बदलाव बहुत कठिन होगा और इन्हें पूरी तरह से लागु करना एक चैलेंज है। इस तरह का परिवर्तन तभी किया जाता है। जब उसके कार्यान्वयन की पूरी तैयारी हो तथा पर्याप्त समय हो तभी वांछित परिणाम मिल पाएंगे। डा. पाण्डेय ने स्पष्ट किया कि शैक्षिक उद्देश्यों की पूर्ति एवं शैक्षिक मानक का निर्धारण, अध्यापक, पाठ्यक्रम, सीखने और मूल्यांकन के तरीकों की गुणवत्ता से होता है न कि शैक्षिक संरचना से। कोठारी कमीशन या आजादी के पूर्व की शिक्षा नीतियां संरचना पर ज्यादा ज़ोर देती रही हैं । उन्होंने कहा कि वर्तमान शिक्षा नीति में पूर्व प्राथमिक शिक्षा को जोड़ना 5 + 3 + 3 + 4 संरचना का एक अच्छा कदम है। लेकिन इसके लिए अधिक समर्पण, निधि और अच्छी योजना की आवश्यकता है। डॉ. पाण्डेय ने अपने व्याख्यान में देश कीआजादी से पहले और उसके बाद के प्रमुख कमेटी और कमीशन की रिपोर्ट में शैक्षिक संरचना से सबंधित सुझावों पर बारीकी से चर्चा की और उनके सफलता और चुनौतियों पर प्रकाश डाला। व्याख्यान के दुसरे सत्र में सबके लिए शिक्षा एवं राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 विषय पर पैनल चर्चा हुई।जिसमें शिक्षा पीठ के सहायक प्राध्यापक डा. रवि कान्त ने पिछड़े एवं वंचितों की शिक्षा के संदर्भ में विचार रखते हुए नीति और नियत में साम्य की बात प्रमुखता से उठाई और कहा की ‘सभी के लिए शिक्षा’ के स्थान पर ‘सभी के लिए समान शिक्षा’ की अवधारणा को पूर्ण करना नीतियों को मुख्य केंद्र बिन्दु होना चाहिए। डा. समरेश ने स्पष्ट किया की नीति को धरातल पर लाने हेतु समाज एवं शिक्षकों को अपने दृष्टिकोण में बदलाव लाने होंगे। डा. कविता ने नीति के संदर्भ में चिंता व्यक्त करते हुए कहा की इसके व्यवस्थित क्रियान्वयन न होने की दशा में समाज का एक बड़ा वर्ग शिक्षा से वंचित भी हो सकता है। डा. प्रज्ञा ने अपने वक्तव्य में दिव्यंगों, अन्य भाषयी अल्पसंख्यकों तथा महिलाओं के परिप्रेक्ष्य में नीति की समालोचना प्रस्तुत की। कार्यक्रम का संचालन डॉ. स्वाति एवं निशा ने किया। हिन्दुस्थान समाचार/पंकज/चंदा-hindusthansamachar.in