मिथिलांचल की गलियों में गूंजने लगा 'सामा खेले चलली भौजी संग सहेली'
मिथिलांचल की गलियों में गूंजने लगा 'सामा खेले चलली भौजी संग सहेली'
बिहार

मिथिलांचल की गलियों में गूंजने लगा 'सामा खेले चलली भौजी संग सहेली'

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बेगूसराय, 22 नवम्बर (हि.स.)। मिथिलांचल की संस्कृति लोक कला और लोक उत्सवों से परिपूर्ण है। यहां साल में कई ऐसे उत्सव मनाए जाते हैं जो मिथिला की शान हैं। ऐसा ही एक लोक उत्सव है भाई-बहन के अटूट प्रेम का प्रतीक सामा-चकेवा। सूर्योपासना का महापर्व छठ संपन्न होते ही शनिवार की रात से मिथिला की लोक संस्कृति का उत्सव सामा-चकेवा शुरू हो गया है। आठ दिन तक चलने वाले इस लोक पर्व का समापन कार्तिक पूर्णिमा की रात्रि में होगा। सामा-चकेवा को लेकर हर गलियां मैथिली गीतों से गुंजायमान हो गई है। हर गली में सुनाई दे रहा है 'सामा खेले चलली भौजी संग सहेली, जुग जुग जियो हो, हो भैया जिओ हो।' बदलते परिवेश के बाद सामा-चकेवा खेलने वालों की संख्या में कमी आई है। इसके बावजूद लोगों का उत्साह चरम पर है। भाई बहन के कोमल और प्रगाढ़ रिश्ते को बेहद मासूम अभिव्यक्ति देने वाला यह लोक उत्सव मिथिला संस्कृति के समृद्धता और कला का एक अंग है, जो सभी समुदायों के बीच व्याप्त बाधाओं को भी तोड़ता है। इस लोक पर्व लेकर महिलाओं और युवतियों ने सामा, चकेवा, चुगला, सतभइयां, टिहुली, कचबचिया, चिरौंता, हंस, सतभैंया, चुगला, बृंदावन सहित अन्य मूर्ति को बांस से बने दउरा में सजाकर तैयार किया है तथा रात में इसे ओस चाटने के लिए घर के बाहर छोड़ दिया जाता है। सभी रात के समय एक दूसरे के साथ हंसी ठिठोली करती लगातार आठ दिनों तक सामा खेलेंगी। इस दौरान आंगन में जहां समदाउन, ब्राह्मण एवं गोसाउन गीत, भजन गूंज रहा है। वहीं, सामा खेलने के दौरान भाई के प्रेम और ननद भाभी की हंसी ठिठोली मिथिला की माटी को एक नई खुशबू दे रही है। उत्सव के अंतिम दिन कार्तिक पूर्णिमा की रात सभी समदाउन गाते हुए विसर्जन के लिए समूह में घर से निकलेगी और नदी, तालाब के किनारे अथवा खेत में चुगला के मुंह में आग लगा बृंदावन से बुझाकर सामा-चकेवा सहित अन्य मूर्ति को अगले साल आने की कामना के साथ विसर्जित कर दिया जाएगा। मिथिलांचल के मनमोहक पावन संस्कृति की याद ताजा करती सामा-चकेवा की कहानी श्रीकृष्ण काल से जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण की पुत्री श्यामा और पुत्र साम्ब के बीच अपार स्नेह था। कृष्ण की पुत्री श्यामा का विवाह ऋषि पुत्र चारूदत्त से हुआ था। दुष्ट स्वभाव के मंत्री चुरक के भड़काने पर उन्होंने श्यामा को पक्षी बन जाने का श्राप दे दिया तो चारूदत्त ने भी भगवान शंकर को प्रसन्न कर पक्षी का रूप प्राप्त कर लिया। श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब ने पिता की आराधना कर बहन-बहनोई को मानव रूप में वापस लाने का वरदान मांगा। तब श्रीकृष्ण ने श्राप मुक्ति का उपाय बताते हुए कहा था कि सामा और चकेवा की मूर्ति बनाकर उनके गीत गाएं और चुरक की कारगुजारियों को उजागर करें तो दोनों फिर से अपने पुराने स्वरूप को प्राप्त कर सकेंगे। तभी से बहनों द्वारा भाई के दीर्घायु होने की कामना के लिए सामा-चकेवा पर्व मनाया जाता है। हिन्दुस्थान समाचार/सुरेन्द्र/रामानुज-hindusthansamachar.in