बक्सर की राजनीत में कभी सशक्त हस्ताक्षर रहे बामपंथ का ढह गया किला लगभग आईसीयू में
बक्सर की राजनीत में कभी सशक्त हस्ताक्षर रहे बामपंथ का ढह गया किला लगभग आईसीयू में
बिहार

बक्सर की राजनीत में कभी सशक्त हस्ताक्षर रहे बामपंथ का ढह गया किला लगभग आईसीयू में

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बक्सर 13 सितम्बर (हि ,स )। लगभग बीस वर्षो तक बक्सर की राजनीति में सशक्त हस्ताक्षर बनकर छाई वामपंथ विचार धारा अब स्थानीय राजनीति में हासिये पर है |सन अस्सी के मध्य दशक से 1995 तक बक्सर की राजनीति में वाम पार्टियों का वह दबदबा था कि कांग्रेस सत्ता के खिलाफ लड़ने के लिए भाजपा को छोड़ कर प्रायः सभी पार्टियों को वाम पार्टियों के शरणागत होना पड़ता था |तब एक वर्ग विशेष में बामविचारधारा के लोगो में मजबूत पकड़ थी | तब भी वामपंथ विचारधारा के लोग टुकडो में बटे सीपीआई ,सीपीआई (एम्) और भाकपा (माले ) के बैनर तले अलग -अलग लाल पताका को थामे हुए थे |तब के समय में सीपीआई का धडा मजबूत था दूसरे क्रम में सीपीआई (एम्) खड़ी थी पर भाकपा (माले ) तत्कालीन राजनीति में इनसे दूरी बनाये हुए थी | वर्ष 1989 के दौर में सूबे में सत्ता परिवर्तन की लड़ाई में कांग्रेस हुकुमत के खिलाफ बक्सर संसदीय सीट पर एक समझौते के तहत सीपीआई ने अपने प्रत्याशी तेज नारायण सिंह यादव को उतार कर तत्कालीन दिग्ज कांग्रेसी सांसद केके तिवारी को हराने में कामयाब हुई थी |तब बक्सर बातौर भोजपुर जिले का अनुमंडल था और सीपीआई लेफ्ट सेक्युलर एलायंस का हिस्सा था |दो बार बक्सर संसदीय सीट पर सीपीआई से सांसद बने तेज नारायण के जित के पीछे बाम विचार धारा से अलग लालूप्रसाद यादव के मुस्लिम -यादव (माई )के तुरुप के पत्ते ने कमाल दिखाया था |यह जित वामपंथ विचारधारा की नही थी। यह दीगर बात है की तत्कालीन परिस्थिति वस शोषित समाज के अंदर यादव कोइरी कुर्मी और अन्य पिछड़ी जाती वर्ग के लोग लाल पताका थामे हुए थे।पर राजनीत के माहिर खिलाड़ी लालू यादव सूबे की रानीति में यादव ,मुस्लिम कार्ड को खेल कर सर्वाधिक क्षति बामधड़े को ही पहुचाई |शेष दिनों में स्थानीय तौर पर बाम ह्र्श्र यह हुआ की सीपीआई ,और सीपीआई (एम)की गिनती समता पार्टी से अलग हो लालू प्रसाद की राजद की पिछलग्गू के तौर पर होने लगी | बक्सर की राजनीति में वामपंथ का सशक्त हस्ताक्षर ज्योति प्रकाश की पुत्री मंजू प्रकाश बक्सर विधानसभा की सीट से राजद एलायंस के तहत प्रत्याशी महज इस लिए बनाया गया था कि वे बिहार वामपंथ के ओजपूर्ण नेता रामदेव वर्मा की पत्नी थी |तब बामपंथ की बैशाखी पर खड़ी राजद सरकार में मंजू प्रकाश की अलग शानी थी |इस दौर तक आते आते स्थानीय वामपंथ विचारधारा की लड़ाई से अलग हट कर विशुद्ध रूप से जातिगत राजनीति में उलझ गई |और इसके पतन का दौ शुरू हो गया | 1995 में राजपुर विधान सभा की (सुरक्षित ) से सीपीआई प्रत्याशी अर्जुन राम का बसपा प्रत्याशी छेदी पासवान को हराना वामपंथ की जित से इतर जातिगत समीकरण की जीत थी जहा तत्कालीन परिस्थिति में यूपी के सीमावर्ती इस सीट पर मायावती के दलित कार्ड का स्थानीय दलितों पर अच्छा ख़ासा असर हुआ था और बक्सर का स्थानीय लालकिला (बामपंथ ) वजूद विहीन हो चला था |यह दीगर बात है की इस दौर में भी भाकपा (माले ) बक्सर की राजनीति में ढहते वाम पंथ को बचाने के लिए तब भी प्रयास कर रही थी और अब भी प्रयास रत है |पर जातीय राजनितिक समीकरण के सन्मुख बाम विचारधारा वजूद विहीन है | खेत ,खलिहान ,मजदूर ,किसान की समस्याओं को लेकर किसी भी सत्ता से लड़ने वाली बाम पार्टिया जब सत्ता के मोहजाल में उलझ गई और वाम धडा के आधारभूत मतदाता पिछड़ी जातियों में मायावती के बसपा का दखल बढने से वर्ष 2000 और 2005 के बिहार विधानसभा चुनाव में राजपुर (सुरक्षित )सीट से छेदी पासवान और बक्सर विधानसभा की सीट से हृदय नारायण यादव बसपा के बैनर तले विजयी हुए थे कभी वाम विचार धारा से प्रभावित जिले का एक बड़ा तबका कब जातीय समीकरण में उलझ गया |इसकी समीक्षा करने में स्थानीय वामपंथ के नेता चुक कर गये और स्थानीय राजनीत में लाल किले पर लाल निशान मांग रहा है हिन्दुस्तान का नारा नेपथ्य में चला गया | हिन्दुस्थान समाचार /आय मिश्रा /चंदा-hindusthansamachar.in