नई शिक्षा व्यवस्था से एतिहासिक सुधार होना तय: राठौर
नई शिक्षा व्यवस्था से एतिहासिक सुधार होना तय: राठौर
बिहार

नई शिक्षा व्यवस्था से एतिहासिक सुधार होना तय: राठौर

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गया, 07 सितंबर (हि.स.) । दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो डा. हरिश्चंद्र राठौर ने कहा है कि नई शिक्षा नीति से देश की शिक्षा व्यवस्था में एतिहासिक सुधार होना तय है। उन्होंने कहा कि केन्द्रीय शिक्षा मंत्रालय द्वारा आधिकारिक घोषणा के बाद नई शिक्षा नीति के प्रावधानों एवं स्वायत्तता इत्यादि विषयों पर अब तक काफी चर्चा हो चुकी है लेकिन अब सही समय आ गया है। हम सब इसके क्रियान्वयन पर ध्यान दें। साथ-ही-साथ इसे लागू करने के लिए इसके विभिन्न पहलुओं पर ध्यान देने की अति आवश्यकता है। उन्होंने सोमवार को यह बात कही । उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति के मुख्य बिंदुओं पर विचार करने के साथ - साथ इससे जुड़े छोटे -से-छोटे बिंदु पर ध्यान आकर्षित करने की ज़रूरत है। जब इससे जुड़े बिंदुओं एवं उससे संबंधित समस्याओं को रेखांकित कर लें, उसके बाद उस समस्या के निदान के विषय मे सोचने की जरूरत है।तभी नई शिक्षा नीति सफलतापूर्वक लागू हो सकती है। कुलपति प्रोफ़ेसर राठौर ने सोमवार को विवि एवं शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय वेब संगोष्ठी के अध्यक्षीय सम्बोधन में बोल रहे थे। जन सम्पर्क पदाधिकारी मो. मुदस्सीर आलम ने बताया कि ‘स्वायत्तता की कसौटी पर नयी शिक्षा नीति’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी की अध्यक्षता कुलपति प्रो. हरिश्चंद्र सिंह राठौर ने की। इस अंतर्राष्ट्रीय वेबिनार में करीब 250 लोगों ने ऑनलाइन भाग लिया जिसमें भारत के साथ-साथ अमेरिका से भी कई विद्वान शिक्षाविद् शामिल थे। प्रो. राठौर ने इस संगोष्ठी के माध्यम से सभी विद्वतजनों को आह्वान करते हुए कहा कि वे राष्ट्र निर्माण की भावना से नई शिक्षा नीति लागू करवाने के लिए कमर कस लें तभी भारत की वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में सुधार लाया जा सकता है। बिहार राज्य विश्वविद्यालय शिक्षा सेवा आयोग के सदस्य एवं शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के प्रान्त संयोजक प्रो. विजय कांत दास के अनुसार विदेशी शिक्षा नीतियों को मूल्यवान प्रयोग समझ कर अपनी शिक्षा व्यवस्था को बदल देना पिछले कुछ वर्षों में की गई सबसे बड़ी भूल थी। भारत के गौरवशाली इतिहास की रीढ़ रहे तक्षशीला और नालंदा जैसे विश्वविद्यालय ने हमारी पहचान विश्व में एक विश्वगुरु के रूप में बनायी थी, जबकि अंग्रेजों ने आजादी के पहले मैकाले शिक्षा व्यवस्था लागू कर हमारी उस रीढ़ को तोड़ कर हमें सदियों पीछे धकेलने का प्रयास किया। अमेरिका के बैरी यूनिवर्सिटी के प्रो. जे. एन. सिन्हा ने भारत की शिक्षा नीतियों और विदेशों में शिक्षा नीतियों की स्वायत्तता के व्यावहारिक पहलुओं पर चर्चा की। उन्होंने भारतीय गुरुकुल पद्धति और उसके व्यावहारिक सदगुणों की चर्चा करते हुए वर्तमान शिक्षा नीतियों को भारत के लिए आने वाले समय के लिए अच्छा बताया। वेब संगोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. रजनीश शुक्ला ने कहा कि इस बार शिक्षा नीति में जो आमूल-चूल बदलाव नजर आ रहे हैं, यह पूरे 185 वर्षों के बाद हमें प्राप्त हुये हैं । भारत में शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर लगातार सवाल हो रहे हैं परन्तु हम पहले से शिक्षा के मूल्यों को सही रूप से स्थापित कर चुके थे। विगत एक सदी से हमारे यहां भाषा और भारतीय शिक्षा पद्धति को लेकर संतोषपूर्ण कार्य नहीं हुए और यही कारण है कि हम अंग्रेजी और हिन्दी की लड़ाई में उलझ गए हैं। विशिष्ट अतिथि के रूप शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के राष्ट्रीय संयोजक प्रो. दुर्ग प्रसाद अग्रवाल ने नई शिक्षा नीति और भारतीयता की चर्चा करते हुए यह बताया कि स्वायत्तता को हर स्तर पर शामिल करना होगा। इस कार्यक्रम का संचालन सीयूएसबी के इतिहास विभाग के अध्यक्ष प्रो. सुधांशु कुमार झा ने किया। कार्यक्रम में उपस्थित सभी लोगों का धन्यवाद ज्ञापन मीडिया विभाग के अध्यक्ष प्रो. आतिश पराशर ने किया। हिंदुस्थान समाचार/ पंकज कुमार/विभाकर-hindusthansamachar.in