आज प्रासंगिक है 'क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात नहीं कहोगे'
आज प्रासंगिक है 'क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात नहीं कहोगे'
बिहार

आज प्रासंगिक है 'क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात नहीं कहोगे'

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बेगूसराय, 31 जुलाई (हि.स.)। साहित्य को समाज की धरातल पर उतारने वाले मुंशी प्रेमचंद को उनकी जयंती पर शुक्रवार को श्रद्धापूर्वक याद किया गया। इस अवसर पर बेगूसराय के गोदरगावां के विप्लवी पुस्तकालय में अवस्थित उनकी प्रतिमा पर पुष्पांजलि एवं माल्यार्पण किया गया। मुंशी प्रेमचंद को याद करते हुए प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस) के पूर्व राष्ट्रीय महासचिव सह पुस्तकालय के संरक्षक राजेन्द्र राजन ने कहा कि प्रेमचंद देश की आजादी को अपना लक्ष्य मानते थे। वे एक बेहतर भारत की कल्पना कर रहे थे, उनका कहना था वह साहित्य कोरा है जिसका कोई लक्ष्य नहीं हो। उन्होंने किसानों के दुःख-दर्द को लिखा। लेकिन किसानों की हालत आज भी वहीं है, उनका सपना आज भी अधूरा है। पुस्तकालय सचिव आनन्द प्रसाद सिंह एवं पुस्तकाध्यक्ष मनोरंजन विप्लवी ने कहा कि प्रेमचंद गरीब शोषित-पीड़ित की आवाज को कलम के माध्यम से उजागर किया, स्त्री विमर्श को साहित्य से जोड़ा, खुद विधवा विवाह कर समाज को संदेश देने का काम किया। साहित्य को यथार्थ से जोड़ा। समाज को साहित्य से जोड़कर प्रगतिशील मूल्यों के साथ आगे बढ़ाया तो उनका साहित्य आज भी प्रासंगिक है। साहित्य और समाजनिति को लेकर चर्चित रामकृष्ण ने उन्हें याद करते हुए कहा कि पंच परमेश्वर में मुंशी प्रेमचंद ने एक चर्चित पात्र खालाजान से एक संवाद कहलवाया था। ये संवाद खालाजान ने जूम्मन के अनन्य मित्र अलगू चौधरी को कही थी। संवाद था 'क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात नहीं कहोगे। हिन्दुस्थान समाचार/सुरेन्द्र/चंदा-hindusthansamachar.in