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दुनिया

क्यों मनाया जाता है तिब्बत का शांतिपूर्ण मुक्ति दिवस?

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बीजिंग, 22 मई (आईएएनएस)। चीन में 23 मई को तिब्बत का शांतिपूर्ण मुक्ति दिवस मनाया जाता है। इस साल तिब्बत की शांतिपूर्ण मुक्ति की 70वीं वर्षगांठ है। आखिर 23 मई को तिब्बत की शांतिपूर्ण मुक्ति दिवस क्यों होता है? इसे सही मायने में जानने के लिए हमें पिछली सदी के मध्य के पास चीन के इतिहास पर जरा नजर डालनी होगी। दूसरे विश्व युद्ध के बाद यानी चीन में जापानी आक्रमण विरोधी युद्ध के बाद चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीसी) और क्वोमिनतांग यानी नेशनलिस्ट पार्टी के बीच गृहयुद्ध हुआ, जिसे चीनी जन मुक्ति युद्ध भी कहा जाता है। कठोर संघर्ष के बाद सीपीसी ने व्यापक जनता का समर्थन हासिल कर अपना वर्चस्व कायम किया और 1 अक्टूबर 1949 को नए चीन की स्थापना की, जबकि नेशनलिस्ट पार्टी को थाईवान द्वीप पर भागना पड़ा। गृहयुद्ध के दौरान तिब्बत की स्थानीय सरकार की सत्ता ब्रिटेन समर्थित अलगाववादी शक्तियों के हाथ में पड़ी। साम्राज्यवाद का तथाकथित तिब्बती स्वतंत्रता का षड्यंत्र विफल करने और मुख्य भूमि की मुक्ति पूरी करने के लिए जनवरी 1950 के शुरू में सीपीसी केंद्रीय कमेटी ने तिब्बत पर अभियान चलाने का फैसला किया। लेकिन तिब्बती जनता की भावना पर ठेस पहुंचाने से बचने और राष्ट्रीय एकता मजबूत करने के ख्याल से सीपीसी केंद्रीय कमेटी ने तिब्बत की शांतिपूर्ण मुक्ति करने की रणनीति निर्धारित की। केंद्रीय सरकार ने तिब्बती स्थानीय सरकार को समझाने के लिए कई बार प्रतिनिधि भेजे। लेकिन अलगाववादियों से नियंत्रित तिब्बत की स्थानीय सरकार ने वार्ता टालने की कोशिश की और सैन्य तैयारी मजबूत की। इस पृष्ठभूमि में अक्टूबर 1950 में चीनी जन मुक्ति सेना (पीएलए) ने तिब्बत के पूर्व में स्थित छांगतू को मुक्त किया, जिसने अलगाववादी शक्ति पर भारी प्रहार किया और तिब्बत की शांतिपूर्ण मुक्ति के लिए मजबूत आधार तैयार किया। फरवरी, 1951 में तिब्बत की स्थानीय सरकार ने पेइचिंग में केंद्रीय सरकार के साथ शांति वार्ता करने का फैसला किया। 14वें दलाई लामा ने केंद्रीय सरकार को भेजे पत्र में शांति वार्ता की इच्छा जताई। 29 अप्रैल को केंद्रीय सरकार और तिब्बत की स्थानीय सरकार ने शांतिपूर्ण मुक्ति के लिए औपचारिक वार्ता शुरू की और अंत में सिलसेलिवार मुद्दों पर सहमति प्राप्त की। 23 मई को दोनों पक्षों ने तिब्बत की शांतिपूर्ण मुक्ति के उपायों के समझौते पर हस्ताक्षर किए, जो इस बात का प्रतीक है कि तिब्बत की शांतिपूर्ण मुक्ति हुई है। तब से 23 मई तिब्बत का शांतिपूर्ण मुक्ति दिवस बन गया। इस समझौते में ऐसे अहम विषय शामिल हैं, जैसे तिब्बती जनता का एकजुट होकर साम्राज्यवादी शक्ति को तिब्बत से हटाया जाए और तिब्बती जनता मातृभूमि के बृहद परिवार में लौटे, पीएलए तिब्बत में प्रवेश कर प्रतिरक्षा मजबूत करे, केंद्रीय सरकार तिब्बत के सभी वैदेशिक मामलों का निपटारा करे केंद्रीय सरकार के नेतृत्व में तिब्बती जनता को जातीय स्वायत्तता लागू करने का अधिकार हो, तिब्बती जनता के धर्म व रीति रिवाज का सम्मान और इत्यादि। इस समझौते पर हस्ताक्षर किए जाने से चीन की मुख्य भूमि पूरी तरह मुक्त हो गई और तिब्बत के भावी सामाजिक विकास तथा सुधार के लिए राजनीति नींव डाली गई। सितंबर, 1951 में पीएलए का अग्रिम दस्ता ल्हासा के उपनगर पहुंचा। तिब्बती स्थानीय सरकार ने एक भव्य समारोह आयोजित कर पीएलए का स्वागत किया। सितंबर 1951 से जून 1952 तक पीएलए ने तिब्बत के विभिन्न क्षेत्रों पर पहुंचकर तिब्बत पर अभियान का कार्य पूरा किया। उल्लेखनीय बात है कि 29 अप्रैल 1954 को चीन और भारत के प्रतिनिधियों ने पेइचिंग मेंचीन के तिब्बत और भारत के बीच व्यापार और यातायात की संधि पर हस्ताक्षर किए और इसके साथ नोट की अदला-बदली कर भारत द्वारा ब्रिटेन से तिब्बत में विरासत के रूप सें लिण् गए विशेषाधिकार को रद्द किया गया। 70 साल में तिब्बत में कायापलट हुआ है। वर्ष 2020 में तिब्बत की जीडीपी 1 खरब 9 अरब युआन से अधिक रही और ग्रामीण क्षेत्रों में प्रतिव्यक्ति आय 14,598 युआन थी और प्रतिव्यक्ति आवास का क्षेत्रफल 41.46 वर्गमीटर था। तिब्बत के बुनियादी ढांचे और सामाजिक कार्य के विकास में भी दिन दूना रात चौगुना बढ़ा है। अब तिब्बत अधिक ऊंची मंजिल पर पहुंच गया है। (साभार : चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग) --आईएएनएस एसजीके