नेपाल से एक 16 वर्षीय लड़की के उत्पीड़न, बलात्कार और हत्या की जाँच कराने की पुकार

नेपाल से एक 16 वर्षीय लड़की के उत्पीड़न, बलात्कार और हत्या की जाँच कराने की पुकार
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संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार समिति ने सोमवार को एक निर्णय सुनाते हुए कहा है कि नेपाल में अधिकारियों को, फ़रवरी 2004 में, देश के गृह युद्ध के दौरान, सुरक्षा बलों द्वारा एक 16 वर्षीय लड़की के उत्पीड़न, बलात्कार और उसकी हत्या के मामले की व्यापक जाँच करानी होगी. यूएन मानवाधिकर समिति का ये निर्णय, उस लड़की के माता-पिता की शिकायत पर सुनवाई के बाद सुनाया गया है. लड़की के माता-पिता का कहना है कि उन्होंने अपने देश में न्याय पाने और जवाबदेही निर्धारित करने की तमाम सम्भावनाओं के अवसर आज़मा लिये. दण्डमुक्ति पर ध्यान यूएन मानवाधिकार समिति की सदस्या हैलेन तिगरूद्जा ने कहा कि इस मामले को अलबत्ता 18 वर्ष गुज़र चुके हैं, मगर अब भी इसकी गम्भीरता, समय के साथ फीकी नहीं पड़ी है. उन्होंने कहा, “ये इसलिये भी बहुत गम्भीर मामला है कि इसमें एक बच्ची को आनन-फ़ानन में मार दिया गया. इस मामले से गृह युद्ध के दौरान लड़कियों के साथ हुए दुर्व्यवहार, उत्पीड़न और बलात्कार के रुझान, जाँच-पड़ताल के अभाव और दण्डमुक्ति की वास्तविकता का भी पता चलता है.” नेपाल में 1996 में गृहयुद्ध भड़का था जो लगभग एक दशक तक चला. उस दौरान सरकारी सेनाओं और नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी के बीच लड़ाई में लगभग 15 हज़ार लोग मारे गए थे. कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्यों को माओवादी विद्रोही गुट के नाम से भी जाना जाता था. आरोप और इनकार फ़रवरी 2004 में, आर.आर. नामक वो पीड़ित लड़की, कवरे ज़िले के पोखरी गाँव में, अपने परिवार के साथ रहती थी. उस इलाक़े में बहुत से माओवादी समर्थक, गृहयुद्ध शुरू होने की आठवीं वर्षगाँठ मनाने के लिये एकत्र हुए थे. 13 फ़रवरी की रात को, लगभग 20 वर्दीधारी सशस्त्र सैनिकों ने उस लड़कीके घर पर अचानक धावा बोल दिया और सैकण्डरी स्कूल की छात्रा आर.आर पर माओवादी होने का आरोप लगाया, जिससे उस लड़की ने इनकार किया. यूएन समिति के अनुसार, आर.आर. ने स्कूल में माओवादी छात्र संघ की अनिवार्य बैठक में हिस्सा लिया था, मगर अन्य किसी भी तरह की माओवादी गतिविधि में शामिल नहीं थी. पूछताछ, प्रताड़ना, मृत्यु उस किशोर लड़की को उसके घर बाहर निकाल दिया गया, उससे पूछताछ की गई, उसे रायफ़ल की बट से मारा-पीटा गया, दीवार से भी पटका गया, और मक्का के एक खेत में ले जाया गया. एक सैनिक को, दूसरे सैनिक से कहते सुना गया कि उस लड़की को मार दो, और उसके बाद बन्दूक की तीन गोलियाँ चलीं. अगली सुबह, आर.आर. के माता-पिता को उसका शव मिला. उसकी आँख, सिर, और सीने में गोलियाँ मारी गई थीं. उसकी शलवार (पायजामा) जांघों तक नीचे खींचा गया, उसका ब्लाउज़ खींचकर गले तक सरका दिया गया. उसके नितम्बों पर नोच-ख़रोंच के निशान थे. सेना ने उस रात दो अन्य ग्रामीणों को भी जान से मारा था. आर.आर. के परिवार की शिकायत के बाद, नेपाल के राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने 2005 में पाया कि उस लड़की को सुरक्षा बलों ने मारा था. नेपाल के सुप्रीम कोर्ट ने, अलबत्ता मानवाधिकार आयोग के निष्कर्षों की 2009 में पुष्टि की थी और एक त्वरित जाँच के आदेश दिये थे, मगर किसी की भी आपराधिक जवाबदेही निर्धारित नहीं की गई. मुख्य अभियुक्त को, चार वर्ष बाद सबूतों के अभाव में रिहा कर दिया गया था. न्याय के लिये अपील आर.आर. के माता-पिता इस मामले को संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार समिति तक लाए, जिसने पाया कि नेपाल, उस लड़की की हत्या व बलात्कार, और उसके शारीरिक व मानसिक उत्पीड़न के लिये ज़िम्मेदार है. मानवाधिकार समिति ने, आर.आर. के माता-पिता को भी कोई असरदार उपचार या राहत नहीं मुहैया कराए जाने की भी आलोचना की. समिति की सदस्या हैलेन तिगरूद्जा ने कहा कि नेपाल यह दिखाने में नाकाम साबित हुआ है कि एक 16 वर्षीय निहत्थी लड़की, पूर्ण रूप से सशस्त्र 20 सैनिकों के एक दस्ते को, किस तरह कोई ख़तरा उत्पन्न कर रही थी. ये सही ठहराना तो बहुत दूर की बात है कि उसका बलात्कार और उसे आनन-फ़ानन में मार देने से, किसी भी तरह का कोई वैध सुरक्षा उद्देश्य किस तरह पूरा होता था. उन्होंने कहा कि इस तरह के भीषण और हृदयविदारक अपराधों की समय पर, पूर्ण और व्यापक जाँच होना ज़रूरी है और इन अपराधों के लिये ज़िम्मेदार तत्व जहाँ कहीं भी हों, उन्हें न्याय के कटघरे में लाकर, दण्डित करना बहुत ज़रूरी है. यूएन समिति के बारे में यूएन मानवाधिकार समिति, देशों द्वारा अन्तरराष्ट्रीय नागरिक व राजनैतिक अधिकारों पर सन्धि (the International Covenant on Civil and Political Rights) के पालन की निगरानी करती है. इस समिति में 18 सदस्य होते हैं जो दुनिया भर से स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञ होते हैं. वो अपनी निजी हैसियत में काम करते हैं और इस सन्धि के किसी पक्ष देश के प्रतिनिधि के रूप में काम नहीं करते हैं. इस समिति के सदस्य ना तो यूएन स्टाफ़ होते हैं, और ना ही उन्होंने संयुक्त राष्ट्र से कोई वेतन मिलता है. --संयुक्त राष्ट्र समाचार/UN News

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