याद आते रहेंगे इरफान

याद आते रहेंगे इरफान
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ब्रजेश कुमार नई दिल्ली, 29 अप्रैल (हि.स)। इकहरी हड्डी और छरहरे बदन वाला इरफान 20वीं शताब्दी के आखिरी दशक में ही अभिनय का लोहा मनवा चुका था। अभिनय का शौक-शगल ऐसा था कि पूछिए मत। मां चाहती थी कि बेटा घर के नजदीक कहीं टीचरी कर ले। लेकिन, बेटे को यह मंजूर नहीं था। 21 साल की उम्र थी। उसने ‘सलाम बॉम्बे’ नामक फिल्म में अभिनय किया, जिसे पूरी दुनिया में सराहना मिली। यह अलग बात है कि अगले कई सालों तक वे छोटे पर्दे पर ही संघर्ष करते रहे, लेकिन 21वीं शताब्दी में इरफान अपने समय के जीनियस साबित हुए। अपनी आत्मकथा में किशोर साहू ने लिखा है- ‘तराजू में एक पल्ले पर अच्छी शक्ल हो और दूसरे पर अच्छा अभिनय तो अच्छी शक्ल वाला पल्ला ही भारी रहेगा। उन दिनों भी था, आज भी है, और कल भी रहेगा।’ ऐसी ढेरों धारणाओं को इरफान ने साथ-साथ चुनौती दी और खंडित कर दिया। यह साधारण बात नहीं थी। घुंघराले बाल, चौड़ा ललाट और बड़ी रहस्यमयी आंखों वाला यह अभिनेता जितना सहज इलाहाबाद विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति में दिखाई दिया, उतनी ही सहजता से उसने भिंड, मुरैना के बीहड़ में दौड़ लगाई। सच तो यह है कि इरफान खान एक्टिंग से एक्टिविस्ट थे। उनके अभिनय का नशा युवाओं पर साफ दिखने लगा था। तमाम सफल फिल्मों के बावजूद उन्होंने खुद को स्टारडम में नहीं फंसने दिया। सिनेमा जगत में उन्होंने अलग पहचान बनाई। किसी बड़े स्टार से उनकी लोकप्रियता कहीं भी कमतर नहीं रही। इरफान की फिल्में यह स्मरण कराती रहेंगी कि भारतीय सिनेमा ने समय से पहले एक जीनियस को खो दिया। आज इरफान खान को गए पूरे एक साल हो गए। हिन्दुस्थान समाचार