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बूंद नहीं है तो समुद्र भी नहीं है

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 गौरतलब है 22 जुलाई 1853 को मार्क्स अपने निबंध'भारत में ब्रिटिशराज के भावी परिणाम' में लिखते हैं 'बुर्जुआ (पूंजीवादी) सभ्यता का अथाह पाखंड और उसकी जन्मजात बर्बरता खुले रूप में हमारे सामने है। वह सभ्यता स्वदेश में शालीन बनी रहती है लेकिन उपनिवेशों में नंगा नाच करती है।' इसके करीब 35 साल बाद सन् 1888 में फैजाबाद के अस्थायी कमिश्नर हारिंग्टन लिखते हैं 'किसानों की अवस्था की अच्छी तरह आलोचना (समीक्षा) कर देखने से मेरी भी यही धारणा हो गई है कि भारत में अधिकांश स्थान के किसान साल के अधिकांश समय पेट भर खाना न खा पाने के कारण अत्यन्त दुख पाते हैं।' मार्क्स जो कह रहे थे उसे औपनिवेशिक
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