तूफान अम्फान ने ढाया कहर Hindi Latest News 

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तूफान अम्फान ने ढाया कहर

तूफान अम्फान ने ढाया कहर

प्रमोद भार्गव बंगाल की खाड़ी से उठा चक्रवाती तूफान अम्फान ने पश्चिम बंगाल और ओडिशा में कहर ढा दिया है। इस तूफान ने 15 मई को विशाखापट्नम से 900 किमी दूर दक्षिण पूर्व की ओर दक्षिण बंगाल की खाड़ी में कम दबाव और फिर गहरे निम्न दबाव का क्षेत्र बनाना शुरू किया था। 17 मई को जब यह दीघा से

1200 किमी दूर था, तब यह तूफान में तब्दील हुआ और उत्तर-पश्चिम दिशा में तेज हवाओं के साथ आगे बढ़ा। 18 मई को इन हवाओं की रफ्तार 200 से 240 किमी प्रतिघंटा हो गई, नतीजतन इसने महातूफान का विध्वंसकारी रूप धारण कर लिया। 20 मई को इसने बंगाल और ओडिशा में प्रवेश कर तबाही का मंजर रच दिया। इस दौरान समुद्री लहरों ने 4 से 5 मीटर ऊपर उठकर कोलकाता और दीघा के हजारों घरों में पानी भर दिया। कोलकाता का हवाई अड्डा पानी में डूब गया। 5500 घर ध्वस्त हो गए और हजारों पेड़ व बिजली के खंभे धराशायी हो गए। बंगाल में 15 और ओडिशा में 2 लोगों की मृत्यु की खबर है। यही हाल उस हटिया द्वीप का हुआ, जो बंगाल से लेकर बंग्लादेश के हटिया द्वीप तक फैला है। इसी क्षेत्र में सुंदर वन का वह वन्यप्राणी राष्ट्रीय उद्यान है, जो बाघ, गेंडा और नाचने वाले संघाई हिरणों के लिए दुनिया में जाना जाता है। मौसम विभाग की सटीक भविष्यवाणी और आपदा प्रबंधन के समन्वित प्रयासों के बावजूद तूफान अम्फान अपना असर दिखाकर आगे बढ़ गया। इसके पहले इन दोनों राज्यों के इसी इलाके में बुलबुल और फैनी चक्रवातों ने 2019 में तबाही मचाई थी। मौसम विभाग की चेतावनी के बाद राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन बल (एनडीआरएफ) ने तत्परता बरतते हुए ओडिशा के 12 लाख और बंगाल के तीन लाख लोगों को तटीय क्षेत्रों से हटाकर सुक्षित स्थानों पर पहले ही भेज दिया था। इसके लिए एनडीआरएफ की 41 टीमें तैनात थीं। 24 टीमें आपात स्थिति से निपटने के लिए आरक्षित रखी गई थीं। प्रत्येक टीम में 45 लोग होते हैं। इस तूफान का असर पश्चिम बंगाल के 10 और ओडिशा के 12 जिलों में देखा गया। साथ ही सिक्किम, मेघालय, असम केरल और कर्नाटक में भी इस चक्रवाती प्रभाव में भारी बारिश होने के साथ तेज हवाएं भी चलीं। बिहार में भी हवा के साथ बारिश हुई। भारतीय मौसम विभाग के अनुमान अक्सर सही साबित नहीं होते, इसलिए उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठते रहे हैं। किंतु अब समझ आ रहा है कि मौसम विभाग आपदा का सटीक अनुमान लगाकर समाज और प्रशासन को आपदा से जूझने की पूर्व तैयारियों में लगाने में समर्थ हो गया है। अन्यथा 20 मई को आए तूफान अम्फान से ओडिशा और पश्चिम बंगाल को निपटना मुश्किल होता। किंतु इसबार चेतावनी मिलने के साथ ही शासन-प्रशासन और समाज ने जागरुकता व संवेदनशीलता बरतते हुए जान-माल की ज्यादा हानि नहीं होने दी। फेलिन, हुदहुद, तितली, बुलबुल और फैनी चक्रवात से जुड़ी भविष्यवाणी भी सटीक बैठी थीं। दरअसल जलवायु परिवर्तन और आधुनिक विकास के कारण देश ही नहीं दुनिया आपदाओं की आशंकाओं से घिरी हुई है। ऐसे में आपदा प्रबंधन की क्षमताओं और संसाधनों को हमेशा सचेत रहने की जरूरत है। उत्तरी हिंद महासागर में आने वाले तूफानों के लिए 64 नाम पहले ही निश्चित कर लिए गए हैं। इनमें से 63 नामों को तूफानों के नाम पहले ही दे दिए गए हैं। इस 64वें तूफान का नाम अम्फान रखा गया है। अम्फान नाम थाइलैंड ने दिया था। इसका अर्थ थाई भाषा में आसमान होता है। हमारे मौसम विज्ञानी सुपर कंप्युटर और डापलर राडार जैसी श्रेष्ठतम तकनीक के माध्यमों से चक्रवात के अनुमानित और वास्तविक रास्ते का मानचित्र एवं उसके भिन्न क्षेत्रों में प्रभाव के चित्र बनाने में भी सफल रहे हैं। तूफान की तीव्रता, हवा की गति और बारिश के अनुमान भी कमोबेश सही साबित हुए। इन अनुमानों को और कारगर बनाने की जरूरत है, जिससे बाढ़, सूखे, भूकंप, आंधी और बवंडरों की पूर्व सूचनाएं मिल सकें और इनसे सामना किया जा सके। साथ ही मौसम विभाग को ऐसी निगरानी प्रणालियां भी विकसित करने की जरूरत है, जिनके मार्फत हर माह और हफ्ते में बरसात होने की राज्य व जिलेवार भविष्यवाणियां की जा सकें। यदि ऐसा मुमकिन हो पाता है तो कृषि का बेहतर नियोजन संभव हो सकेगा। साथ ही अतिवृष्टि या अनावृष्टि के संभावित परिणामों से कारगर ढंग से निपटा जा सकेगा। किसान भी बारिश के अनुपात में फसलें बोने लग जाएंगे। लिहाजा कम या ज्यादा बारिश का नुकसान उठाने से किसान मुक्त हो जाएंगे। मौसम संबंधी उपकरणों के गुणवत्त्ता व दूरंदेशी होने की इसलिए भी जरूरत है, क्योंकि जनसंख्या घनत्व की दृष्टि से समुद्रतटीय इलाकों में आबादी भी ज्यादा है और वे आजीविका के लिए समुद्री जीवों पर निर्भर हैं। लिहाजा समुद्री तूफानों का सबसे ज्यादा संकट इसी आबादी को झेलना पड़ता है। इस चक्रवात की सटीक भविष्यवाणी करने में निजी मौसम एजेंसी स्काईमेट कमोबेश नाकाम रही है। 1999 में जब ओडिशा में नीलम तूफान आया था तो हजारों लोग सटीक भविष्यवाणी न होने और आपदा प्रबंधन की कमी के चलते मारे गए थे। 12 अक्टूबर 2013 को उष्णकटिबंधीय चक्रवात फैलिन ने ओडिशा तट पर दस्तक दी थी। अंडमान सागर में कम दबाव के क्षेत्र के रूप में उत्पन्न हुए नीलम ने 9 अक्टूबर को उत्तरी अंडमान-निकोबार द्वीप समूह पार करते ही एक चक्रवाती तूफान का रूप ले लिया था। इसने सबसे ज्यादा नुकसान ओडिशा और आंध्र प्रदेश में किया था। इस चक्रवात की भीषणता को देखते हुए 6 लाख लोग सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाए गए थे। तूफान का केंद्र रहे गोपालपुर से तूफानी हवाएं 220 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से गुजरी थीं। 2004 में आए सुनामी तूफान का असर सबसे ज्यादा इन्हीं इलाकों में देखा गया था। हालांकि हिंद महासागर से उठे इस तूफान से 14 देश प्रभावित हुए थे। तमिलनाडू में भी इसका असर देखने में आया था। इससे मरने वालों की संख्या करीब 2 लाख 30 हजार थी। भारत के इतिहास में इसे एक बड़ी प्राकृतिक आपदा के रूप में देखा जाता है। 8 और 12 अक्टूबर 2014 में आंध्र एवं ओडिशा में हुदहुद तूफान में भी भयंकर कहर बरपाया था। इसकी दस्तक से इन दोनों राज्यों के लोग सहम गए थे। भारतीय नौसेना एनडीआरएफ ने करीब 4 लाख लोगों को सुरक्षित क्षेत्रों में पहुंचाकर उनके प्राणों की रक्षा की थी। इसलिए इसकी चपेट आने से केवल छह लोगों की मौंतें हुई थीं। हालांकि आंध्र प्रदेश में सबसे ज्यादा तबाही 1839 में आए कोरिंगा तूफान ने मचाई थी। गोदावरी जिले के कोरिंगा घाट पर समुद्र की 40 फीट ऊंची उठी लहरों ने करीब 3 लाख लोगों को निगल लिया था। समुद्र में खड़े 20,000 जहाज कहां विलीन हुए पता ही नहीं चला। 1789 में कोरिंगा से एक और समुद्री तूफान टकराया था, जिसमें लगभग 20,000 लोग मारे गए थे। कुदरत के रहस्यों की ज्यादातर जानकारी अभी अधूरी है। जाहिर है, चक्रवात जैसी आपदाओं को हम रोक नहीं सकते लेकिन उनका सामना या उनके असर कम करने की दिशा में बहुत कुछ कर सकते हैं। भारत के तमाम इलाके बाढ़, सूखा, भूकंप और तूफानों के लिहाज से बेहद संवेदनशील हैं। जलवायु परिवर्तन और प्रदूषित होते जा रहे पर्यावरण के कारण ये खतरे और इनकी आवृत्ति लगातार बढ़ रही है। कहा भी जा रहा है कि फेलिन, ठाणे, आइला, आईरिन, नीलम और सैंडी जैसी आपदाएं प्रकृति की बजाय आधुनिक मनुष्य और उसकी प्रकृति विरोधी विकास नीति का पर्याय हैं। इस बाबत गौरतलब है कि 2005 में कैटरीना तूफान के समय अमेरिकी मौसम विभाग ने इस प्रकार के प्रलयंकारी समुद्री तूफान 2080 तक आने की आशंका जताई थी लेकिन वह सैंडी और नीलम तूफानों के रूप में 2012 में ही आ धमके। 18 साल पहले ओड़िशा में सुनामी से फूटी तबाही के बाद पर्यावरणविदों ने यह तथ्य रेखांकित किया था कि अगर मैग्रोंव वन बचे रहते तो तबाही कम होती। ओड़िशा के तटवर्ती शहर जगतसिंहपुर में एक औद्योगिक परियोजना खड़ी करने के लिए एक लाख 70 हजार से भी ज्यादा मैंग्रोव वृक्ष काट डाले गए थे। दरअसल, जंगल एवं पहाड़ प्राणी जगत के लिए सुरक्षा कवच हैं, इनके विनाश को यदि नीतियों में बदलाव करके नहीं रोका गया तो तय है कि आपदाओं के सिलसिलों को भी रोक पाना मुश्किल होगा। लिहाजा नदियों के किनारे आवासीय बस्तियों पर रोक और समुद्र तटीय इलाकों में मैंग्रोव के जंगलों का संरक्षण जरूरी है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
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