इतिहास भी गवाह वैश्विक महामारी से बचाव में सामाजिक दूरी ही कारगर Hindi Latest News 

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इतिहास भी गवाह, वैश्विक महामारी से बचाव में सामाजिक दूरी ही कारगर

इतिहास भी गवाह, वैश्विक महामारी से बचाव में सामाजिक दूरी ही कारगर

- महामारियों का उदय हिमालय क्षेत्र से, सूर्य पर धब्बों की संख्या में कमी भी देती है संकेत - कोरोना पर बीएचयू के शोध छात्र का नजरिया श्रीधर त्रिपाठी वाराणसी, 27 मार्च (हि.स.)। दुनिया में जब-जब भी वैश्विक महामारी फैली है। इसमें सामाजिक दूरी (सोशल डिस्टेंसिंग) और 'आइसोलेट' ही इससे बचाव का एकमात्र तरीका रहा है। इससे पहले सौ-सौ साल

के अंतर पर 1720, 1820, 1920 और अब 2020 में महामारी फैलने का इतिहास रहा है। संक्रामक रोगों के 400 वर्षों के ज्ञात इतिहास को ध्यान से देखेंगे तो हर तरह के वायरस का एक खास कारक रहा है। यदि सदी की महामारियों को देखें तो पायेंगे कि हर बड़ी महामारी का एक निश्चित साइकिल और स्थान रहा है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के प्रबंध शास्त्र के शोध छात्र श्वेतांक मिश्र ने शुक्रवार को 'हिन्दुस्थान समाचार' से बातचीत में कोरोना को लेकर अपने किये गये अध्ययन और शोध निष्कर्षो को साझा किया और इसके फैलने की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि कोरोना वायरस के बढ़ते वैश्विक प्रकोप के कारण मेरी रुचि कुछ उन जर्नल्स, पूर्व के शोधों को लेकर हुई जो इससे संबंधित रहा। कुछ नामचीन जर्नल्स के शोधों नेचर पत्रिका और कुछ कैम्ब्रिज के शोध का अध्ययन करने पर पता चला कि किसी भी तरह के वायरस का सोलर साइकिल से एक गहरा सम्बन्ध है। यदि हम केवल पिछले 400 वर्षों की बड़ी महामारियों पर ही ध्यान दें तो इनमें खास अंतराल है और बड़ी बात ये है कि इन सभी का स्थान एक ही रहा है। श्वेतांक ने उदाहरण देते हुए कहा कि 1620 के आसपास एक इंफ्लुएंजा वायरस के बारे में शोध बतलाते हैं कि इससे 90 फीसदी दक्षिण इंग्लैंड प्रभावित था जबकि इटली में 2 लाख, 80 हजार से भी ज्यादा लोगों की मौत हुई थी। वर्ष 1720 के आसपास प्लेग, 'स्मालपॉक्स', इंफ्लुएंजा ने भी लाखों लोगों की जान ली थी, जबकि 1820 के आसपास कालरा, और 1920 के आसपास स्पेनिश फ्लू ने भी लाखों लोगों को प्रभावित किया था। अब इसी कड़ी में कोविड-19 को लेकर भी ये आशंका जताई जा रही है कि 21 वीं सदी की सबसे बड़ी महामारी हो सकती है। उन्होंने बताया कि इन सभी महामारियों में खास बात ये थी कि इन सभी का उदय हिमालयन क्षेत्र से ही होता है, और सभी का समय काल सूर्य के सोलर मिनिमम के समय ही है। उन्होंने बताया कि सूर्य अपनी एक साइकिल, औसतन 90 या कभी कभी 85 या 105 वर्ष के आसपास पूरी करता है। 1700 के बाद इस पर ध्यान दिया गया और तबसे यह भी पता चला कि एक सोलर मिनिमम साइकिल के बीच भी कई और साइकिल आती हैं जो लगभग 11 वर्ष की होती है। श्वेतांक ने बताया कि 1700 से लेकर अब तक 24 साइकिल पूरी हो चुकी है। अभी सोलर साइकिल 25 दिसम्बर, 2019 से शुरू हुई है जो 2030 तक चलेगी। पिछली साइकिल 2008 से 2019 तक थी। शोध छात्र के अनुसार पिछली साइकिल को पूर्व के शोध कमजोर साइकिल कहते हैं, जबकि अभी की साइकिल इस सदी की ही नहीं बल्कि पूरे 200 वर्षों की सबसे कम सन स्पाट यानि सौर कलंक वाली साइकिल होगी। उन्होंने बताया कि सौर कलंक, सूर्य के प्रकाश मंडल की अस्थायी घटनाएं हैं। जब सूर्य के किसी भाग का ताप अन्य भागों की तुलना में कम हो जाता है तो धब्बे के रूप में दिखता है, इसे सौर कलंक कहते हैं। इस धब्बे का जीवनकाल कुछ घंटे से लेकर कुछ सप्ताह तक होता है। कई दिनों तक सौर कलंक बने रहने के पश्चात रेडियो संचार में बाधा आती है। उन्होंने बताया कि पूर्व के शोधों से पता चलता है कि जब भी सूर्य पर धब्बों की संख्या में कमी आती है तो इसके चुम्बकीय क्षेत्र पर भी प्रभाव पड़ता है जिसके फलस्वरूप पृथ्वी पर ऐसे इलेक्ट्रॉनिक चार्ज पार्टिकल एक्टिव हो जाते हैं जो यहां के वातावरण के अनुकूल नहीं होते। अभी तक के शोध बतलाते हैं कि सोलर मिनिमम की अवस्था में शरीर के आरएनए पर प्रभाव पड़ता है और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता वायरस, बैक्टेरिया से लड़ने में पहले जितनी प्रभावी नहीं हो पाती है जिससे महामारी फैलती है। उन्होंने बताया कि सनस्पॉट संख्या के आधार पर आने वाले महीनों के दौरान वैश्विक स्तर पर इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। सोलर साइकिल पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र के 'जैविक संस्थाओं' को कमजोर करने की अनुमति दे रही है जिसमें डीएनए भी शामिल है जिससे पृथ्वी पर आने वाले दिनों में जीवन प्रभावित हो सकता है। उन्होंने बताया कि इसकी अवधि अभी और लंबी होगी। भविष्य में ऐसी भी सम्भावना है कि सोलर साइकिल के प्रभाव से समुद्री वायरस का प्रकोप भी बढ़े, ऐसे में इससे विशेष सावधानी बरतने की आवश्यकता है। ऐसे में सोशल डिस्टैंसिंग ही एकमात्र इससे बचने का समाधान है। हिन्दुस्थान समाचार
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