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निराशा एक रोग है, फिर इससे शर्माना कैसा

निराशा एक रोग है, फिर इससे शर्माना कैसा

अगर आप भारत के 36 करोड़ 40 लाख किशोरों-नौजवानों (10 से 29 वर्ष) को अलग करके एक नया मुल्क बनाएं तो वह दुनिया का तीसरा सबसे अधिक आबादी वाला देश होगा। हर देश के नौजवानों की तरह हमारे यहां के युवाओं को भी वयस्कता की राह की मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। आंतरिक तौर पर वे तरह-तरह की चिंताओं निजी संघर्षों हार्मोन संबंधी बदलावों तनावों और गहरी भावनाओं से जूझ रहे हैं तो बाहरी तौर पर वे आज उस भारत में जी रहे हैं जो तेजी से बदल रहा है और जिसमें संभावनाओं के साथ-साथ नकारात्मकता से निपटने की दुश्वारियां भी हैं। ये तमाम तरह के दबाव बदलती जीवन-शैली और समाज जेनेटिक व जैविक कारकों के साथ मिलकर
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